अलविदा एम्पायर हिमांशु भाई…जिंदगी की पिच पर आप नॉट आउट रहेंगे

गणेश अग्रवाल/ रायगढ़। आज शक्ति के गुड़ी चौक स्थित लक्ष्मी डेयरी पर चाय की चुस्की नहीं, एक सन्नाटा पसरा था। वो भीड़ जो रोज सुबह चाय के लिए जुटती थी, आज नम आंखों से उस शख्स को अंतिम विदाई देने आई है जिसने इस शहर में ईमानदारी का मिथक रचा था — क्रिकेट एम्पायर हिमांशु चावड़ा
देवेंद्र माओजी चावड़ा के बड़े बेटे हिमांशु सिर्फ एक एम्पायर नहीं थे, वे क्रिकेट के मैदान के ‘सुप्रीम कोर्ट’ थे। तीन दशक तक जिले-तहसील के हर क्रिकेट यज्ञ उनके बिना अधूरा था। ड्यूस बॉल के दौर में, 90 के दशक की काकोली स्मृति से लेकर आज तक, उनकी पैनी नजर बाल सी बारीक गलती भी पकड़ लेती थी। मैदान में शोर जब चरम पर होता, तो हजारों आंखें सिर्फ हिमांशु भाई की उंगली का इंतजार करती थीं। उनका फैसला अंतिम था — कोई अपील नहीं, कोई सुनवाई नहीं।
और ईमानदारी? उसकी मिसाल तो वो किस्सा है जो हर क्रिकेटर की जुबान पर रहेगा। एक बार खुद की गेंद पर बल्लेबाज आउट हुआ। पूरी टीम जीत के जश्न में डूब गई। पर हिमांशु पिच पर शांत खड़े रहे। एम्पायर ने पूछा तो बोले — “वो नो बॉल थी।” जो खिलाड़ी मैच जिताने वाला विकेट लेकर भी खुद को ‘नो बॉल’ दे दे और मैच हार जाए, वो एम्पायरिंग में कितना ईमानदार होगा? ऐसी बानगी शायद अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट ने भी न देखी हो।
200 से ज्यादा मैचों में निष्पक्षता की लकीर खींचने वाले हिमांशु भाई आज सुबह जिंदगी की पिच पर ‘आउट’ करार दिए गए। सूर्योदय ने उंगली उठाई और फैसला सुना दिया। पर इस फैसले से कोई खुश नहीं। जिसने सैकड़ों खिलाड़ियों को आउट दिया, वो खुद आज जिंदगी की जंग हार गया।
बड़े बेटे और छोटी बेटी की जिम्मेदारी पूरी कर वे मुक्त हो चुके थे। सादगी और ईमानदारी उनकी पहचान थी। क्रिकेट का वो पंडित जिसकी मौजूदगी से हर टूर्नामेंट का यज्ञ सफल होता था,..उसका अस्तित्व आज सदा के लिए पंचतत्व के हवाले हो जाएगा
विदा हिमांशु भाई…
आपकी वो उठी हुई उंगली सिर्फ आउट का इशारा नहीं थी, वो ईमान का दस्तखत थी। आने वाली पीढ़ी जब भी निष्पक्षता की बात करेगी, आपका नाम सबसे पहले आएगा। आप जिंदगी की पिच पर भले आउट हो गए हों, पर हमारे दिलों के स्कोरबोर्ड पर आप हमेशा ‘नॉट आउट’ रहेंगे।
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