देश

‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की जीवंत तस्वीर बना काशी-तमिल संगमम

सोमनाथ से काशी और रामेश्वरम तक… संस्कृति की वह डोर जिसने पूरे देश को एक सूत्र में बांध दिया

नई दिल्ली। कुछ दिन पहले सोमनाथ की पावन धरती पर आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के दौरान एक ऐसा भावनात्मक क्षण सामने आया, जिसने भारत की सांस्कृतिक एकता की गहराई को फिर से उजागर कर दिया। वर्ष 1026 में सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे होने पर आयोजित इस कार्यक्रम में एक संदेश बार-बार गूंजता रहा—भारत भौगोलिक रूप से भले ही विशाल हो, लेकिन सांस्कृतिक रूप से एक है।


सौराष्ट्र-तमिल संगमम से काशी-तमिल संगमम तक

इस आयोजन के दौरान ऐसे लोगों से संवाद हुआ, जो पहले सौराष्ट्र-तमिल संगमम में सोमनाथ आए थे और उससे पहले काशी-तमिल संगमम के तहत काशी का भ्रमण कर चुके थे। इन मंचों को लेकर उनकी सकारात्मक सोच और अनुभव यह साबित करते हैं कि ऐसे आयोजन केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के सेतु हैं।


तमिल भाषा और संस्कृति को सम्मान

‘मन की बात’ के एक एपिसोड में यह भाव साझा किया गया था कि तमिल भाषा न सीख पाने का एक व्यक्तिगत अफसोस है। यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि बीते वर्षों में तमिल संस्कृति और भाषा को देशभर में लोकप्रिय बनाने के लिए लगातार प्रयास किए गए हैं।
‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना इन्हीं प्रयासों से और अधिक सशक्त होती है।


काशी और तमिलनाडु: अध्यात्म की साझा विरासत

काशी जहां बाबा विश्वनाथ की नगरी है, वहीं तमिलनाडु में रामेश्वरम जैसे पवित्र तीर्थ हैं। तेनकासी को दक्षिण की काशी कहा जाता है।
पूज्य कुमारगुरुपर्र स्वामी जी ने अपनी विद्वता और अध्यात्म से काशी और तमिलनाडु के बीच एक अटूट संबंध स्थापित किया।
महाकवि सुब्रमण्यम भारती को भी काशी में राष्ट्रवाद और आध्यात्मिक चेतना की नई दिशा मिली, जिसने उनके साहित्य को अमर बना दिया।


2022 से शुरू हुआ सांस्कृतिक संगम

वर्ष 2022 में काशी-तमिल संगमम की शुरुआत हुई। तमिलनाडु से आए लेखक, कलाकार, विद्यार्थी, किसान और विद्वानों ने काशी के साथ-साथ प्रयागराज और अयोध्या के भी दर्शन किए।
इसके बाद—

  • 2023 में टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ, ताकि भाषा बाधा न बने



















  • तीसरे संस्करण में इंडियन नॉलेज सिस्टम पर फोकस रहा


चौथा संस्करण: तमिल सीखने का अनोखा अवसर

2 दिसंबर 2025 को काशी-तमिल संगमम का चौथा संस्करण शुरू हुआ। इस बार की थीम थी—
“तमिल करकलम् वानी: तमिल सीखें”
इस पहल ने काशी और उत्तर भारत के लोगों को तमिल भाषा सीखने का अनूठा अवसर दिया।
प्राचीन तमिल ग्रंथ तोलकाप्पियम का 4 भारतीय और 6 विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया, जिसने भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच दिया।


तेनकासी से काशी तक विशेष व्हीकल एक्सपीडिशन

इस आयोजन का सबसे आकर्षक दृश्य रहा तेनकासी से काशी तक की व्हीकल एक्सपीडिशन
इस अभियान के जरिए पांड्य वंश के महान शासक आदि वीर पराक्रम पांडियन को श्रद्धांजलि दी गई और सांस्कृतिक एकता का संदेश पूरे देश में पहुंचाया गया।


युवाओं का जोश बना आयोजन की जान

इस बार संगमम में युवाओं का उत्साह सबसे खास रहा। सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शैक्षणिक सत्रों और प्रदर्शनियों के जरिए उन्होंने यह साबित कर दिया कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ने को लेकर गंभीर है।


काशी और उत्तर प्रदेश की मेहमाननवाजी

काशी और उत्तर प्रदेश के लोगों ने अतिथियों के स्वागत में कोई कमी नहीं छोड़ी।
कई परिवारों ने तमिलनाडु से आए मेहमानों के लिए अपने घरों के दरवाजे खोल दिए
स्थानीय प्रशासन चौबीसों घंटे सक्रिय रहा। वाराणसी के सांसद के रूप में यह गर्व और संतोष का विषय रहा।


रामेश्वरम में हुआ समापन

इस बार काशी-तमिल संगमम का समापन समारोह रामेश्वरम में हुआ, जिसमें उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन भी शामिल हुए।
उन्होंने कहा कि ऐसे मंच राष्ट्रीय एकता को और मजबूत करते हैं


त्योहारों से जुड़ी एकता की भावना

संक्रांति, उत्तरायण, पोंगल, माघ बिहू जैसे पर्व सूर्य, प्रकृति और कृषि को समर्पित हैं। ये उत्सव समाज को जोड़ते हैं और सद्भाव की भावना को मजबूत करते हैं।


आखिरी संदेश

काशी-तमिल संगमम सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का उत्सव है।
यह मंच हमारी सांझी विरासत को सहेजते हुए आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है—
भारत विविधताओं में नहीं, बल्कि विविधताओं के बावजूद एक है।



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