छत्तीसगढ़

कारखानों में मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा… 3 साल में 296 मजदूरों की मौत, वेदांता हादसे ने फिर जगा दी ‘बालको’ की डरावनी याद

औद्योगिक विकास की रफ्तार के पीछे छिपा खौफनाक सच—हर हादसे के बाद जांच, लेकिन सुरक्षा अब भी सवालों के घेरे में


रायपुर। छत्तीसगढ़ में तेज़ी से बढ़ते औद्योगिक विकास के बीच एक ऐसा सच सामने आ रहा है, जो झकझोर देने वाला है। बड़े-बड़े पावर प्लांट और फैक्ट्रियों के बीच काम कर रहे मजदूरों की सुरक्षा अब भी सबसे बड़ा सवाल बनी हुई है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में औद्योगिक दुर्घटनाओं में 296 मजदूर अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि 248 घायल हुए हैं।

ताज़ा मामला सक्ती जिले के वेदांता पावर प्लांट का है, जहां हुए हादसे ने पूरे प्रदेश को हिला दिया। इस घटना ने एक बार फिर 2009 के उस दर्दनाक बालको हादसे की यादें ताजा कर दी हैं, जब 240 मीटर ऊंची चिमनी गिरने से 40 मजदूरों की मौत हो गई थी। वर्षों बाद भी हालात में कितना बदलाव आया है, यह सवाल अब और गहरा गया है।

प्रदेश में औद्योगिक हादसों का इतिहास भी कम भयावह नहीं रहा। वर्ष 2006 में बलौदाबाजार के रियल इस्पात प्लांट में डस्ट सेटलिंग चेंबर में हुए विस्फोट में 7 श्रमिकों की जान गई थी। हाल के वर्षों में भी ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। 2025 में रायपुर के सिलतरा स्थित गोदावरी स्टील प्लांट में छत गिरने से 6 मजदूरों की मौत हुई, वहीं 2024 में सरगुजा के एलुमिनियम प्लांट में कोयले से भरा बेल्ट गिरने से 4 श्रमिकों ने दम तोड़ दिया।

छोटे-छोटे हादसे भी लगातार मौत का कारण बन रहे हैं। फरवरी 2026 में रायगढ़ की मंगल कार्बन फैक्ट्री में विस्फोट के बाद दो श्रमिकों और एक बच्ची की जान चली गई। मार्च 2026 में बलौदाबाजार के स्वदेश मेटालिक प्लांट में ऊंचाई से गिरने से एक मजदूर की मौत हो गई। इसी तरह भिलाई स्टील प्लांट, बेमेतरा और अन्य जगहों पर भी हादसों का सिलसिला जारी है।

विधानसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, राज्य में कुल 7,324 कारखाने संचालित हैं, जिनमें 948 ‘खतरनाक’ और 32 ‘अत्यंत खतरनाक’ श्रेणी में आते हैं। सरकार की ओर से सुरक्षा मानकों, पीपीई किट और जरूरी सुविधाओं को अनिवार्य बताया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

हर बड़े हादसे के बाद जांच के आदेश जरूर दिए जाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन जांचों के नतीजे कभी जमीनी स्तर पर बदलाव ला पाते हैं? सक्ती के वेदांता प्लांट हादसे ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर कब तक मजदूर अपनी जान जोखिम में डालकर काम करते रहेंगे।







फिलहाल प्रशासन घायलों के इलाज और राहत कार्यों में जुटा है, लेकिन प्रदेश के हजारों मजदूरों के मन में एक ही डर बैठ गया है—अगला हादसा कहीं उनके साथ न हो जाए।

 



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