छत्तीसगढ़

जहां कभी गूंजती थीं गोलियों की आवाज, अब वहां बन रहा ‘नई जिंदगी का किला’… बस्तर का बदला चेहरा चौंकाएगा

नक्सल गढ़ रहे जंगलों में अब सुकून और विकास की दस्तक, हथियार छोड़ चुके हाथों में आया हुनर

बस्तर। कभी लाल आतंक और खौफ की पहचान रहे बस्तर के घने जंगल अब एक ऐसे बदलाव की कहानी लिख रहे हैं, जिसे देखकर यकीन करना भी मुश्किल हो जाता है। जिन इलाकों में कभी कदम रखना खतरे से खाली नहीं था, वहीं आज शांति, रोजगार और उम्मीद की नई तस्वीर उभर रही है।

बस्तर संभाग के सुदूर वनांचल, जो लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों के गढ़ माने जाते थे, अब धीरे-धीरे उस अंधेरे से बाहर निकल चुके हैं। कभी जिन पहाड़ियों और जंगलों में नक्सलियों की ट्रेनिंग होती थी, वहीं अब युवाओं को रोजगार और कौशल सिखाया जा रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि विश्वास और विकास की लगातार कोशिशों का परिणाम है।

लंबे समय तक नक्सल प्रभाव और गलत जानकारी के कारण ग्रामीण मुख्यधारा से कटे रहे। उनके मन में शासन के प्रति अविश्वास पैदा कर दिया गया था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। ग्रामीणों ने समझ लिया है कि हिंसा का रास्ता उनके भविष्य को अंधेरे में ही धकेलता है। यही कारण है कि वे अब विकास की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

सरकार ने इस बदलाव को मजबूत करने के लिए सुरक्षा के साथ-साथ विकास और पुनर्वास को भी बराबर महत्व दिया है। कौशल प्रशिक्षण और पुनर्वास योजनाओं के जरिए हजारों युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा गया है। आर-सेटी और प्रोजेक्ट उन्नति के माध्यम से 5 हजार से अधिक लोगों को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जबकि हजारों परिवारों को आवास की सुविधा भी दी गई है।

प्रधानमंत्री जनमन आवास योजना के तहत विशेष पिछड़ी जनजातियों के लिए 33 हजार से ज्यादा आवासों की स्वीकृति इस दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इसके साथ ही पारदर्शिता बढ़ाने के लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन, पंचायत स्तर पर क्यूआर कोड और डिजिटल प्लेटफॉर्म की मदद से लोगों को सीधे जानकारी दी जा रही है।

सबसे बड़ा बदलाव उन लोगों में देखने को मिल रहा है, जिन्होंने कभी बंदूक उठाई थी। आज वही लोग हुनर सीखकर अपने जीवन को नई दिशा दे रहे हैं। भानुप्रतापपुर के पास ग्राम चौगेल (मुल्ला) का कैंप अब ‘कौशलगढ़’ बन चुका है, जहां 40 आत्मसमर्पित माओवादी अलग-अलग ट्रेड में प्रशिक्षण ले रहे हैं। यहां उन्हें ड्राइविंग, सिलाई, काष्ठशिल्प, इलेक्ट्रिशियन जैसे काम सिखाए जा रहे हैं, साथ ही शिक्षा भी दी जा रही है।









इन युवाओं की कहानियां इस बदलाव की सबसे बड़ी गवाही हैं। कोई पहली बार स्टेयरिंग पकड़ रहा है, तो कोई सिलाई मशीन पर अपने सपनों को आकार दे रहा है। जो कभी हिंसा के रास्ते पर थे, आज वही अपने हाथों से नेम प्लेट, बैग और सजावटी सामान बनाकर आत्मनिर्भर बनने की राह पर हैं।

कांकेर जिला इस बदलाव का उदाहरण बनकर सामने आया है, जहां प्रशिक्षण के बाद आत्मसमर्पित नक्सलियों को निजी क्षेत्र में नौकरी भी दी जा रही है। कुछ युवाओं को 15 हजार रुपए प्रतिमाह के वेतन के साथ रोजगार मिला है, जिससे उनके जीवन में स्थिरता आई है।

बस्तर का यह बदलता चेहरा सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक ऐसी सच्चाई है जो बताती है कि अगर सही दिशा और अवसर मिल जाए, तो सबसे खतरनाक माने जाने वाले इलाके भी शांति और विकास की मिसाल बन सकते हैं। अब सवाल यह नहीं कि बस्तर बदलेगा या नहीं, बल्कि यह है कि यह बदलाव कितनी तेजी से पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल देगा।



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