रायगढ़

जन्मदिन विशेष : सिद्धांतों के सौदागर नहीं, सेवा के पुजारी: 85 वर्षीय सुगन चंद फरमानिया की अनकही दास्तान

 

 

रायगढ़ :- भाजपा की नींव जिन निस्वार्थ कार्यकर्ताओं के पसीने से सींची गई है, उनमें श्री सुगन चंद फरमानिया का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। आज की युवा पीढ़ी भले ही उनके व्यक्तित्व से अनजान हो, लेकिन रायगढ़ की राजनीति में सुगनचंद जी को “भाजपा का वकील” कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं।

सिद्धांतों से कभी कोई समझौता नहीं किया…

राजनीति को काजल की कोठरी माना जाता है जिसमें बेदाग रहना मुश्किल है लेकिन उसूलों के पक्के सुगन चन्द ने इस मिथक को तोड़ने में सफलता पाई है। उसूलों के इतने पक्के रहे कि राजनीति में रहते हुए वे कभी रुपया-पैसा के पीछे कभी नहीं भागे। वरना आज इनका नाम भी रायगढ़ के धन्ना सेठों की सूची में शामिल होता। अपने आप में एक बड़ा औहदा, बड़ा नाम होते हुए भी सुगनचंद जी एक आम, सामान्य इंसान का ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं खादी का कुर्ता, सादगी भरी हंसी और हर कार्यकर्ता के लिए दरवाजा हमेशा खुला रखना यही उनकी पहचान है।

जन्म और संघर्ष









13 मई 1942 को ग्राम फरमाना, जिला रोहतक में जन्मे सुगनचंद जी ने 1958 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की। छठवीं में गुरुमुखी में अव्वल रहे और मुंडी हिंदी भी सीखी। 1958 में रायगढ़ आए, राउरकेला में कपड़ा दुकान संभाली। 1967 में जनसंघ से जुड़े और 1970 में रायगढ़ आकर रायपाली में छोटी सी राशन दुकान से जीवन शुरू किया।

जीवन की दुखद घटनाएं जो सुनकर आंखें भर आएं

उनके जीवन में कई ऐसे बड़े दुखद मोड़ आए जिन्हें सुनकर कोई भी अंजान आदमी की आंखों में आंसू आ जाए। परिवार की जिम्मेदारियां, आर्थिक तंगी, अपनों का बिछड़ना हर दर्द को सीने में दबाकर पार्टी का झंडा थामे रहे। मीसा बंदी बने, 10 दिन जेल काटी, पर उसूल नहीं छोड़े। जब साथी पद और पैसे के पीछे भागे, तब सुगनचंद जी बूथ की पर्ची बांटते रहे। घर में अभाव रहा, पर कभी किसी ठेकेदार या अफसर के आगे हाथ नहीं फैलाया।

भाजपा के सच्चे सिपाही

1975 के आपातकाल में मीसा बंदी हुए। 6 अप्रैल 1980 को भाजपा गठन और दिसंबर 1980 के बॉम्बे अधिवेशन के साक्षी रहे। वर्षों रायगढ़ नगर अध्यक्ष रहे, पर पद का मोह कभी नहीं किया। चुनावी नियमों के इतने ज्ञाता कि निर्वाचन अधिकारी भी उनके तर्कों के सामने निरुत्तर हो जाते थे।

2003: एक आदमी ने हिला दिया पूरा सिस्टम

मतदाता सूची में गड़बड़ी पर प्रमाण सहित लड़े। दिल्ली से जांच अधिकारी बुलवाए और पूरे छत्तीसगढ़ की मतदाता सूची दोबारा बनवाई*l। यह कलेजा सिर्फ सुगनचंद जी में था।

कांग्रेस के गढ़ में सेंध
पांच बार के विधायक के.के. गुप्ता जी के अभेद किले में सेंध लगाने वालों में उनका नाम सबसे आगे है। बिना धनबल, सिर्फ जनबल और सिद्धांत के दम पर।

आज 13 मई को 85 वें जन्मदिन पर

जब हम मुड़कर देखते हैं तो एक फकीर सा दिखता है जिसने पार्टी को सब कुछ दिया, बदले में कुछ नहीं मांगा। न बंगला, न गाड़ी, न बैंक बैलेंस। बस एक संतोष कि भाजपा खड़ी है, और मैं उसका एक ईंट हूं।”

सुगनचंद जी, आप राजनीति के उसूल हैं। आप वो दीया हैं जो आंधी में भी बुझा नहीं। आपका जीवन हर कार्यकर्ता को सिखाता है सत्ता नहीं, सेवा बड़ी है। पैसा नहीं, सिद्धांत बड़ा है।”

जन्मदिन पर शत-शत नमन।
आपकी सादगी, आपका त्याग, आपका दर्द भाजपा की असली पूंजी है। ईश्वर आपको स्वस्थ रखे, ताकि नई पीढ़ी आपसे सीख सके कि _“धन्ना सेठ बनना आसान है, सुगन चंद फरमानिया बनना तपस्या है।



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