छत्तीसगढ़

ईसाई मिशनरियों का खतरनाक एजेंडा ने आदिवासियों को सांस्कृतिक और अस्तित्वगत रूप से खत्म करने की साजिश सदियों से चल रही है

झारखंड समेत पूरे देश में ईसाई मिशनरी और कांग्रेस-झामुमो जैसे दलों ने BJP के जन्मकाल से ही एक जहरीला नैरेटिव गढ़ रखा है BJP और RSS आदिवासियों के दुश्मन हैं, वे आदिवासियों का अस्तित्व मिटाना चाहते हैं।
बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू रक्षा दल और RSS को आदिवासियों के दिमाग आदिवासी विरोधी संगठनों के रूप में चित्रित किया गया। मिशनरी स्कूलों, चर्चों, NGO और विदेशी फंडिंग के जरिए यह प्रोपगैंडा लगातार फैलाया जाता है और उसी का नतीजा है कि आदिवासी समाज आज भी इस जाल से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है।

आदिवासियों को हिंदू से अलग दिखाना के इसका मुख्य एजेंडा ये है कि मिशनरी जानते हैं कि जितने ज्यादा आदिवासी अपनी सनातन जड़ों सरना-आदिवासी परंपरा से जुड़ेंगे, उतना उनका धर्मांतरण मुश्किल होते जाएगा इसलिए मिशनरियों लगातार यह प्रचार करते हैं कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं, वे अलग धर्म के हैं और आज डीलिस्टिंग का विरोध करने के लिए भी यही बात पर जोर दिया जा रहा है

जो आदिवासी डीलिस्टिंग की मांग कर रहे हैं (जिन्होंने धर्मांतरण कर लिया है), उन्हें मिशनरी और उनके एजेंट आदिवासियों का अस्तित्व खत्म करने की साजिश बता रहे हैं। जबकि असल में डीलिस्टिंग का मतलब है जो लोग आदिवासी परंपरा को छोड़कर ईसाई बन गए, उन्हें अनुसूचित जनजाति के आरक्षण, पांचवीं अनुसूची और अन्य लाभों से वंचित करना।
यह पूरी तरह संवैधानिक और न्यायसंगत है। लेकिन मिशनरी इसे आदिवासी विरोध बताकर भड़का रहे हैं।

BJP के पास 2014 से ही संसद में पर्याप्त बहुमत है। अगर BJP सच में आदिवासियों का अस्तित्व खत्म करना चाहती तो वह आसानी से हिंदू राष्ट्र घोषित कर सकती थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उल्टा, आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों, संस्कृति और जड़ों की रक्षा के लिए काम कर रही है।
मिशनरियों को डर इस बात का है कि अगर धर्मांतरित आदिवासियों को डीलिस्ट किया गया, तो उनके बड़े पैमाने पर हो रहे कन्वर्जन पर ब्रेक लग जाएगा।
उसके लिए मिशनरियों भटके हुए आदिवासी नेता जो अपने ही जड़ों से कट गए है उसको हथियार बना कर इस्तेमाल कर रहे है
कुछ स्वार्थी आदिवासी नेता, जो कांग्रेस-झामुमो की गोद में बैठे हैं, वो मिशनरी एजेंडे केfrontman बन गए हैं। वे आदिवासियों को भड़काते हैं, लेकिन वो खुद चुपके चुपके हिंदू संस्कृति को भी मनाते है बिरसा मुंडा जो मिशनरी हस्तक्षेप के खिलाफ लड़े थे, आज उनके नाम पर ही वही आदिवासी दलालों जो खुद को आदिवासी हितैषी बताते है उसी मिशनरी एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम कर रहे है ।

आदिवासियों को पीड़ित और अलग पहचान देकर उन्हें मुख्य भारतीय सांस्कृतिक धारा से काटना।
मिशनरियों बड़े पैमाने पर आदिवासियों का धर्मांतरण कर उन्हें ईसाई साम्राज्य का हिस्सा बनाना है और आदिवासियों की रूढ़िप्रथा को खत्म करना है इसी लिए वो जनजाति सांस्कृतिक समागम जैसे कार्यक्रमों का विरोध कर रहे है, क्योंकि ये कार्यक्रम आदिवासियों को उनकी भारतीय संस्कृति और सनातन की जड़ों से जोड़ रहा है।
ये लोग Customary Law का हवाला देकर हिंदू-सनातन से अलग रखने का एजेंडा चला रहे है,

हमारी असली लड़ाई जनजाति शब्द से नहीं, बल्कि उन लोगों से भी है जो आपकी संस्कृति, पहचान और भविष्य को बेच रहे हैं।
सरना-सनातन एक है यह कोई किसी पर थोप नहीं रहा है ,बल्कि हमारी रूढ़ि परंपरा और सांस्कृतिक निरंतरता लाना है ।
जो लोग आदिवासियों को बार-बार BJP दुश्मन है का भ्रम बता रहे हैं, वे खुद मिशनरी फंडिंग और कांग्रेस की टिकट के लालच में बिक चुके हैं।
डीलिस्टिंग एक मध्य है कि जो सरना परम्परा की जड़ों से कट गये है वो अपनी जड़ों की ओर वापस लौटे। तो जनजाति को अपनी सांस्कृतिक परंपरा को बचाना है , न कि मिशनरी एजेंडे की गुलामी करना है।











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