छत्तीसगढ़

वन विभाग द्वारा 40 एकड़ भूमि पर तैयार करोड़ों रुपये की लागत का चाय बगान हुआ बंजर

 

रमेश शर्मा/ जशपुर। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में पंडरापाठ क्षेत्र में चाय की खेती के लिए अनुकूल जलवायु के मद्देनजर यंहा वन विभाग द्वारा मनाेरा विकासखंड में ग्राम कांटाबेल में 40 एकड़ जमीन पर लगाया गया चाय बागान अब पूरी तरह से उजाड़ हो चुका है।

डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक लागत का चाय बगान में एक भी पौधे जीवित नहीं हैं। बागान घेरने के लिए किया गया फेसिंग तार का घेरा तक टूट चुका है। कांटाबेल चाय बागान का प्रोजेक्ट 1 करोड़ 54 लाख रुपए का था। इसे जशपुर वन मंडल ने तैयार कराया था।
इस चाय बागान की स्थापना के वक्त बागान स्थापित करने के लिए डीएमएफ से 75 लाख, मनरेगा से 49 लाख , वनविभाग से 30 लाख की राशि खर्च की गई थी और किसानों की जमीन पर चाय के पौधे रोपे गए थे। किसानों को चाय के अलावा अतिरिक्त लाभ भी मिले, इसके लिए बागान में नाशपाती के पौधे भी लगाए गए थे। पर वर्तमान में चाय बागान वाली जमीन बंजर होकर खाली पड़ी है। इसे देखकर ऐसा नहीं लग रहा है कि कभी यहां चाय बागान भी स्थापित हुआ था।

दरअसल कांटाबेल का यह चाय बगान प्रोजेक्ट पांच साल का था। प्रारंभिक पांच साल तक प्रशासन ने विभिन्न मदों से इसमें पैसे खर्च किए। समय–सीमा पूरा होने के बाद फंडिंग खत्म हो गई और पैसे आने बंद हो गए। बागान डेवलप कर ग्रामीणों को सुपुर्द कर दिया गया। पर उचित मार्गदर्शन के अभाव में ग्रामीण किसान इसका संचालन नहीं कर सके।

मनाेरा से गोविंदपुर जाने वाली सड़क के किनारे ही चाय बागान की स्थापना की गई थी। इसके लिए एक ही स्थान पर कई किसानों की जमीन ली गई थी। किसानों का कहना है कि पांचवें साल में चाय के पौधे इतने बड़े हो गए थे कि पत्तियों की तुड़ाई शुरू हो सकती थी। तुड़ाई शुरू होने के बाद हर जमीन मालिक की लाखों रुपए में कमाई होती। पर सरकारी फंडिंग
के साथ इस कार्य में चाय के पत्ते तोड़ने का मार्गदर्शन भी नहीं मिल पाया।जिसके बाद चाय के तैयार पौधों की देखभाल तक किसान नहीं कर पाए।

वन विभाग ने किसानों की समिति बनाकर काम करने को कहा था। पर समय पर किसानों को चाय की खेती का अनुभव नहीं होने से वे इसका लाभ नहीं ले पाऐ। इसके फलस्वरूप चाय के पौधों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया। कुछ दिनों तक चाय बागान मवेशियों का चारागाह बना रहा। अब हालत ऐसी है कि यहां मवेशी तक नहीं चरते हैं।
 प्रोजेक्ट पूरा हो चुका है
कांटाबेल का चाय बागान 5 साल का प्रोजेक्ट था। प्रोजेक्ट की समय–सीमा तक वन विभाग द्वारा बागान को सुरक्षित रखा गया था और पौधे भी विकसित हो चुके थे। इसके बाद यह प्रोजेक्टर ग्रामीणों को हैंडओवर किया जा चुका है। ग्राम समिति को इसका संचालन करना था और लाभ भी उन्हीं को होता।
करण सिंह, उप वन मंडल अधिकारी, वन विभाग जशपुर





















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