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बीमारी से हारीं ‘आयरन लेडी’ खालिदा जिया, थम गई बांग्लादेश की राजनीति की एक जुझारू आवाज़

अस्पताल के बेड पर टूटी वर्षों की लड़ाई, लेकिन छोड़ गईं सत्ता, संघर्ष और साहस की अमिट विरासत

ढाका, 30 दिसंबर।
बांग्लादेश की राजनीति में दशकों तक निर्णायक भूमिका निभाने वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की अध्यक्ष और देश की पहली महिला प्रधानमंत्री खालिदा जिया अब इस दुनिया में नहीं रहीं। लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहीं खालिदा जिया ने आज सुबह ढाका के एवरकेयर अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति का एक ऐसा अध्याय बंद हो गया, जिसने सत्ता, संघर्ष और सियासी टकराव की कई कहानियां लिखीं।

बीएनपी के आधिकारिक फेसबुक पेज पर बताया गया कि सुबह करीब 6 बजे, फज्र की नमाज के तुरंत बाद खालिदा जिया का निधन हुआ। पार्टी महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने भी इस दुखद समाचार की पुष्टि की। खबर फैलते ही देश-विदेश में उनके समर्थकों और राजनीतिक हलकों में शोक की लहर दौड़ गई।

गंभीर बीमारी से चल रही थी जंग

द डेली स्टार की रिपोर्ट के अनुसार, 80 वर्षीय खालिदा जिया को 23 नवंबर को एवरकेयर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह दिल और फेफड़ों के संक्रमण से पीड़ित थीं और निमोनिया से भी जूझ रही थीं। लंदन से एडवांस मेडिकल केयर लेकर लौटने के बाद से उनकी सेहत लगातार निगरानी में थी, लेकिन आखिरकार बीमारी के आगे उनकी जंग थम गई।

सत्ता से जेल तक का कठिन सफर

खालिदा जिया ने 1991 के आम चुनाव में जीत के बाद बांग्लादेश की बागडोर संभाली और देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद उन्होंने राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखे—सत्ता, विपक्ष, आंदोलन और जेल तक का सफर तय किया।
08 फरवरी 2018 को भ्रष्टाचार के एक मामले में उन्हें जेल भेजा गया। कोरोना काल में 25 मार्च 2020 को कुछ शर्तों के साथ अस्थायी रिहाई मिली। इस साल 06 अगस्त को उन्हें पूरी तरह रिहा किया गया।

निजी जीवन और राजनीतिक विरासत

1945 में जलपाईगुड़ी में जन्मी खालिदा जिया का असली नाम ‘पुतुल’ था। 1960 में उन्होंने जिया-उर-रहमान से विवाह किया, जो बाद में बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने। 1981 में जिया-उर-रहमान की हत्या के बाद बीएनपी संकट में थी, उसी दौर में खालिदा जिया ने पार्टी की कमान संभाली और उसे नई दिशा दी।
उनके नेतृत्व में बीएनपी ने इरशाद की तानाशाही सरकार के खिलाफ जोरदार आंदोलन किया और 1991 में ऐतिहासिक जीत दर्ज की।

पीछे छूट गया एक युग

खालिदा जिया अपने बेटे तारिक रहमान, बहू और पोती को पीछे छोड़ गईं। उनके छोटे बेटे अराफात रहमान कोको का पहले ही निधन हो चुका है। आज जब उनकी मौत की खबर सामने आई, तो यह सिर्फ एक नेता का निधन नहीं, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति के एक युग का अंत माना जा रहा है।



















खालिदा जिया भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन सत्ता से संघर्ष तक, जेल से वापसी तक की उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए राजनीति का एक जीवंत अध्याय बनकर हमेशा जिंदा रहेगी।



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