सड़क नहीं… तो खाट ही बनी एम्बुलेंस! 10 किलोमीटर तक पहाड़ी रास्तों से प्रसव पीड़ा में तड़पती महिला को उठाकर ले गए परिजन
सुकमा के दंतेशपुरम गांव की दर्दनाक हकीकत — जहां सड़क की कमी ने जनजीवन को बना दिया संघर्ष

सुकमा। ज़िले के कोंटा ब्लॉक के भेजी क्षेत्र के दंतेशपुरम गांव से इंसानियत को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां एक गर्भवती महिला को सड़क न होने की वजह से खाट पर बैठाकर 10 किलोमीटर तक पहाड़ी रास्तों से उठाकर ले जाना पड़ा। यह घटना इलाके की बदहाल बुनियादी सुविधाओं की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है।
जानकारी के अनुसार, 7 माह की गर्भवती माड़वी सोमडी को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। गांव में सड़क न होने के कारण परिजनों और ग्रामीणों ने उसे खटिया पर बैठाया और कंधों पर उठाकर कठिन पहाड़ी रास्तों से करीब 10 किलोमीटर दूर एलाड़मड़गु तक पैदल चले।
वहां से महिला को बाइक एम्बुलेंस के ज़रिए कोंटा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया। बीएमओ डॉ. दीपेश चंद्राकर ने बताया कि महिला का इलाज जारी है और उसकी स्थिति फिलहाल स्थिर है।
गांव के लोगों का कहना है कि दंतेशपुरम में सड़क और स्वास्थ्य दोनों ही सेवाओं की भारी कमी है। पहले यहां मितानिन कार्यकर्ता नियुक्त थी, लेकिन अब कोई स्वास्थ्य प्रतिनिधि मौजूद नहीं रहता।
पति माड़वी मसा ने कहा — “हमारी ज़िंदगी पहाड़ों से भी कठिन है… प्रशासन को अब जागना चाहिए।”
महिला के भाई हेमंत कुमार ने भी दुख जताते हुए कहा कि “अपनी बहन को खाट पर उठाकर पहाड़ी रास्तों से ले जाना, एक ऐसी मजबूरी थी जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।”
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि गछ्छनपल्ली उप स्वास्थ्य केंद्र में केवल एक एएनएम पदस्थ है, जबकि गांव की दूरी करीब 15 से 20 किलोमीटर है। आरएचओ महेंद्र काको की निगरानी में भी इलाके में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हैं।
यह घटना सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की विफलता की कहानी है जो अब भी पहाड़ों के बीच दबी हुई पुकार को सुन नहीं पा रहा।
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