छत्तीसगढ़

स्कूलों में मंत्रोच्चार का फैसला या नई सियासी जंग? रोज राष्ट्रगान के साथ श्लोक पर छिड़ा बवाल

मंत्री के ऐलान के बाद विपक्ष हमलावर, शिक्षा व्यवस्था में बदलाव या एजेंडा लागू करने की तैयारी—बहस तेज


रायपुर। छत्तीसगढ़ में शिक्षा को लेकर एक नया फैसला अब सियासी तूफान में बदलता नजर आ रहा है। आगामी शैक्षणिक सत्र से सरकारी स्कूलों में रोजाना राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के साथ मंत्रोच्चार कराने के ऐलान ने प्रदेश की राजनीति में बहस छेड़ दी है। जहां सरकार इसे संस्कार और समग्र विकास की दिशा में कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे अलग एजेंडे से जोड़कर सवाल उठा रहा है।

स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने जानकारी देते हुए बताया कि नए सत्र में स्कूलों में कई बदलाव किए जाएंगे। इसके तहत हर दिन राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के साथ 2-3 मंत्रों का उच्चारण कराया जाएगा। साथ ही विद्यार्थियों को हर दिन किसी एक महापुरुष के जीवन पर 5 मिनट का व्याख्यान भी दिया जाएगा। शनिवार को स्थानीय खेल और तीज-त्योहारों को बढ़ावा देने के लिए विशेष गतिविधियां आयोजित होंगी। इसके अलावा योग, गार्डनिंग और हाउसकीपिंग जैसी गतिविधियों को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा।

इसी बीच, आधुनिक तकनीक को शिक्षा में शामिल करने के लिए प्राचार्यों की कार्यशाला भी आयोजित की गई है, जिसमें गूगल के विशेषज्ञ एआई के उपयोग पर प्रशिक्षण दे रहे हैं। सरकार का कहना है कि इससे शिक्षा का स्तर बेहतर होगा और छात्रों को नई तकनीक के अनुरूप तैयार किया जा सकेगा।

हालांकि, इस फैसले पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि अभी तक स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं ही पूरी नहीं हो पाई हैं। कई स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, छात्र-छात्राओं को किताबें नहीं मिल पा रही हैं और बच्चियों के लिए शौचालय तक की कमी है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकार सरकारी स्कूलों को शिशु मंदिर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

बैज ने कहा कि स्कूलों में श्लोक और मंत्र पढ़ाने के बजाय सरकार को शिक्षा की बुनियादी समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। उनका मानना है कि यदि सरकार इन मुद्दों पर काम करे, तो शिक्षा व्यवस्था अपने आप बेहतर हो सकती है।

अब यह मुद्दा केवल शिक्षा सुधार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके पीछे की मंशा को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह फैसला शिक्षा में सुधार का जरिया बनता है या फिर सियासी टकराव और तेज हो जाता है।







 



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