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सुप्रीम कोर्ट में उठेगा सदियों का सवाल, आस्था बनाम अधिकार की जंग: क्या बदल जाएगी सबरीमाला की किस्मत?

महिलाओं के प्रवेश से लेकर धार्मिक परंपराओं तक, 9 जजों की संविधान पीठ करेगी ऐसा फैसला जिसका असर पूरे देश की आस्थाओं पर पड़ेगा

नई दिल्ली:
देश में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के अधिकारों को लेकर जारी बहस अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट की 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस बेहद संवेदनशील और विवादित मुद्दे पर सुनवाई शुरू कर दी है, जो 22 अप्रैल तक चलेगी। इस सुनवाई में केवल सबरीमाला मंदिर ही नहीं, बल्कि कई धर्मों से जुड़े ऐसे प्रश्न उठेंगे जो आस्था और समानता के बीच सीधी टकराहट को सामने लाते हैं।

करीब 26 वर्षों से लंबित 50 से अधिक याचिकाएं इस सुनवाई का हिस्सा हैं। इन याचिकाओं में महिलाओं के साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव को चुनौती दी गई है। अदालत का यह फैसला आने वाले समय में देश की धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के अधिकारों की दिशा तय कर सकता है।


सुनवाई के केंद्र में क्या है?
इस बार सबसे बड़ा मुद्दा केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का है, जहां वर्षों से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर रोक रही है। इसके अलावा मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना और पारसी महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी सुनवाई होगी।

इन सभी मामलों को एक साथ संविधान पीठ के सामने रखा गया है, ताकि व्यापक संवैधानिक नजरिए से एक बड़ा फैसला लिया जा सके।


सुनवाई का पूरा शेड्यूल
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, सबरीमाला पुनर्विचार याचिका की सुनवाई 7 अप्रैल को सुबह 10:30 बजे से शुरू हो चुकी है।
7 से 9 अप्रैल तक पुनर्विचार की मांग करने वाले पक्ष अपनी दलीलें रखेंगे, जबकि 14 से 16 अप्रैल के बीच विरोध करने वाले पक्ष अपनी बात अदालत के सामने रखेंगे।


कैसे शुरू हुआ सबरीमाला विवाद?
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की जड़ें दशकों पुरानी हैं। यह प्रतिबंध भगवान अय्यप्पा के ब्रह्मचर्य व्रत और मासिक धर्म से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित बताया जाता है।
1990 में शुरू हुआ यह विवाद धीरे-धीरे अदालतों तक पहुंचा और 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नोटिस जारी किया।








2018 का फैसला जिसने मचा दी थी हलचल
2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी थी। अदालत ने इस प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया था।
इस फैसले के बाद देशभर में विरोध और समर्थन की लहर देखने को मिली। इसी बीच बिंदू कनकदुर्गा और बिंदू अमिनी पहली महिलाएं बनीं जिन्होंने मंदिर में प्रवेश किया।


अब मामला 9 जजों तक क्यों पहुंचा?
2019 में सात जजों की पीठ ने इस मामले को बड़े संवैधानिक सवालों से जोड़ते हुए 9 जजों की पीठ को सौंप दिया। इसके साथ ही अन्य धर्मों में महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मामलों को भी इसमें शामिल कर लिया गया।

अब यह पीठ तय करेगी कि धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों के बीच सीमा रेखा कहां खींची जाए।


सबसे बड़े सवाल, जिन पर टिके हैं सबकी नजरें
इस ऐतिहासिक सुनवाई में कई ऐसे सवाल उठेंगे, जो सीधे देश की सामाजिक और धार्मिक संरचना को प्रभावित कर सकते हैं:

  • क्या हर आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश का अधिकार मिलना चाहिए?

  • क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में नमाज अदा करने से रोका जा सकता है?

  • क्या दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?

  • क्या गैर-पारसी से विवाह करने वाली महिलाओं को अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है?

  • क्या व्यक्तिगत कानूनों को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखा जा सकता है?


संविधान बनाम परंपरा की टकराहट
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल पुनर्विचार याचिकाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के बीच संतुलन जैसे बड़े मुद्दों पर विचार करेगा।

यह भी तय किया जाएगा कि ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ क्या है और अदालत को इसमें हस्तक्षेप करने की सीमा क्या होनी चाहिए।


फैसले के दूरगामी असर
यदि सुप्रीम कोर्ट अपने 2018 के फैसले को बरकरार रखता है, तो यह देशभर में धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की नई सीमाएं तय कर सकता है।
यह निर्णय न केवल महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करेगा, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बीच संतुलन बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।


क्या कह रहे हैं अलग-अलग पक्ष?
केंद्र सरकार ने पहले महिलाओं के प्रवेश का समर्थन किया था, लेकिन बाद में इसे व्यापक संवैधानिक मुद्दा बताते हुए संतुलित रुख अपनाया।

अखिल भारतीय संत समिति का मानना है कि अदालत को धार्मिक मामलों में सीमित हस्तक्षेप करना चाहिए।

केरल सरकार का कहना है कि परंपराओं में बदलाव से पहले समाज और विद्वानों से संवाद जरूरी है।

वहीं, अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जैन समुदाय का भी यही मानना है कि धार्मिक प्रथाओं का निर्धारण उनके अनुयायियों द्वारा ही किया जाना चाहिए।



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