छत्तीसगढ़

जिस विभाग का मुखिया आईएफएस, वहां के रिसोर्ट में हिरण का गोश !, पर्यटन के प्रमोशन का नायाब तरीका

 

रायपुर। भारतीय वन सेवा में चयनित अफसरों को प्रशिक्षण के दौरान यह बात घुट्टी के साथ पिलाई जाती है कि वन संरक्षण तथा वन्यप्राणियों का संरक्षण उनकी प्राथमिकता में रहने चाहिए क्योंकि वन और वन्यप्राणियों के बिना वन अफसरों का वजूद खत्म हो जाएगा। छत्तीसगढ़ में इसका उलट हो रहा है। जंगलों को तो बेरहमी के साथ काटा ही जा रहा है, अब पर्यटकों को लुभाने के लिए वन्यप्राणियों का गोश भी परोसा जाने लगा है। पर्यटन मंडल के जिस रिसोर्ट में ऐसा करने का मामला सामने आया है, उस मंडल के प्रबंध संचाक भारतीय वन सेवा के ही एक अधिकारी हैं। इस घटना को लेकर सरकार की गंभीरता अब तक सामने नहीं आई है क्योंकि आरोपियों की गिरफ्तारी के अलावा पर्यटन मंडल ने अपने अफसरों व जिम्मेदारों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है, जिससे संकेत मिलता है कि पर्यटन मंडल के मुख्यालय से इस प्रकार की गतिविधियों के लिए स्वीकृति है।

बिलासपुर जिले के कोटा स्थित कुरदर वैली रिसॉर्ट में पिछले सप्ताह हिरण का मांस पकाने का मामला सामने आया है। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम ने रिसॉर्ट में दबिश दी और किचन से पका हुआ मांस जब्त किया। कार्रवाई के दौरान वन विभाग ने रिसॉर्ट के मैनेजर समेत चार कर्मचारियों को गिरफ्तार किया है। पकड़े गए आरोपियों में रजनीश सिंह, रमेश यादव, संजय वर्मा और रामकुमार टोप्पो शामिल हैं। वहीं इस पूरे मामले में मांस सप्लाई करने वाला आरोपी जनक बैगा फरार है।

यहां दिलचस्प पहलू यह है कि पर्यटन मंडल के प्रबंध संचालक भारतीय वन सेवा के अधिकारी हैं, जो प्रतिनियुक्ति पर हैं। उनका लिहाज किए बिना वन विभाग ने ही पर्यटन मंडल के रिसोर्ट में छापेमारी कर दी। शायद इस अफसर की अहंकारी छवि के कारण विभाग के छोटे कर्मचारियों ने लिहाज नहीं किया और उन्हें आइना दिखा दिया। घटना के सामने आने के बाद सचिवालय स्तर पर जो पड़ताल कराई गई और उसमें जो जानकारियां सामने आईं, वह चौंकाने वाली है।

जांच में पाया गया कि इस रिसोर्ट में 10 मार्च से कोई पर्यटक रुका ही नहीं है, जिसके लिए हिरण का गोश बनाया जा रहा था। रिसोर्ट का मैनेजर पर्यटन मंडल मुख्यालय में पदस्थ एक प्रभावशाली अधिकारी की नजदीकी रिश्तेदार है, जिसकी सरपरस्ती में यह काम किया जा रहा है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि मुख्यालय में जिस अफसर पर जिम्मेदारी रिसोट्र्स की देखभाल करने की है, उस पर भी नजर-ए-इनायत हैं। इस तरह सचिवालय के अफसर जिम्मदारी तय नहीं कर पा रहे हैं। इस घटना से सरकार की किरकिरी हो रही है और यह कहा जा रहा है कि पर्यटन के विकास व पर्यटकों को रिझाने के लिए भला यह कौन सा तरीका है। वैसे जिन लोगों ने पड़ोस के मध्यप्रदेश के पर्यटन मंडल को रिसोट्र्स में रुकने का आनंद उठाया है, उन्हें छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल को रिसोट्र्स का अनुभव बहुत ही खराब मिला है। यहां की व्यवस्थाओं ने उन्हें हमेशा निराश ही किया है।







सवाल यह है कि सरकार के नुमाइंदे पर्यटन विकास की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उद्योग का दर्ज दिया गया है लेकिन जिस तरह की नौकरशाही के हाथों में इस काम को दिया गया है, उसको देखकर तो नहीं लगता कि आने वाले कुछ सालों में देश-दुनिया के पर्यटन के नक्शे में कहीं भी छत्तीसगढ़ का नाम दिखाई देगा। पर्यटन मंडल के रिसोट्र्स के कमरों और उनके बाथरूमों से आने वाली बदबू, गंदी चादरें, खराब खाना और कोसने वाली हास्पिटिलिटी के कारण छत्तीसगढ़ का पर्यटन ऊंचाई पर पहुंचेगा, इसमें संदेह है।

बहरहाल पर्यटन को आकर्षक बनाने के लिए नौकरशाही पर लगाम कसने की जरूरत है। प्रतिनियुक्ति पर आकर पर्यटन मंडल को चारागाह बनाने वाले अफसरों पर हंटर चलाना जरूरी है क्योंकि ऐसे अफसर केवल मौज-मस्ती और सैर-सपाटा करने आते हैं। उन्हें अच्छी तरह मालूम होता है कि कुछ बरसों में उन्हें अपने मूल विभाग में वापस लौटना है इसलिए पर्यटन मंडल में रहते हुए जीवन का लुत्फ उठा लें।



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