छत्तीसगढ़

सौतेली मां, पर दिल से ‘सच्ची मां’… बेटी के लिए अदालत तक लड़ाई, हाई कोर्ट का फैसला चौंकाने वाला

मानसिक दिव्यांग बेटी की गार्जियन बनने की जंग, हाई कोर्ट ने सीधे दखल से किया इंकार, दिया नया रास्ता

बिलासपुर।
रिश्तों की परिभाषा को बदल देने वाली एक कहानी अदालत तक पहुंची, जहां ‘सौतेली मां’ ने साबित कर दिया कि ममता खून के रिश्तों की मोहताज नहीं होती। लेकिन इस भावनात्मक जंग के बीच कानून की दीवार भी खड़ी हो गई, जिसने मामले को नया मोड़ दे दिया।

26 वर्षीय मानसिक रूप से दिव्यांग युवती की देखभाल कर रही उसकी सौतेली मां पिछले कई सालों से उसे कानूनी रूप से अपनी गार्जियन बनाने की लड़ाई लड़ रही है। 2022 से चल रही इस जद्दोजहद में अब छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का फैसला सामने आया है।

मामले में हाई कोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया, लेकिन याचिकाकर्ता को पूरी तरह निराश भी नहीं किया। अदालत ने उन्हें दिव्यांगों के लिए गठित लोकल कमेटी के समक्ष आवेदन देने की स्वतंत्रता दी और कमेटी को कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

जानकारी के अनुसार, महिला ने 2012 में युवती के पिता से विवाह किया था। युवती की सगी मां का पहले ही निधन हो चुका था। शादी के बाद पारिवारिक विवाद बढ़ने पर महिला अपनी सौतेली बेटी को लेकर अपने मायके मनेन्द्रगढ़ आ गई और उसकी परवरिश करती रही।

स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब अक्टूबर 2022 में जैविक पिता ने कथित रूप से बेटी को जबरन अपने साथ ले जाने की कोशिश की, जिसे पुलिस हस्तक्षेप के बाद रोका गया। इसके बाद महिला ने बेटी की कानूनी अभिभावक बनने के लिए परिवार न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

हालांकि, परिवार न्यायालय ने आवेदन खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि नेशनल ट्रस्ट एक्ट 1999 के तहत ऐसे मामलों में गार्जियन नियुक्त करने का अधिकार फैमिली कोर्ट के पास नहीं है। इसके बाद महिला ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की।









हाई कोर्ट ने भी इसी कानूनी आधार पर याचिका खारिज कर दी, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता लोकल कमेटी के पास जाकर अपनी बात रख सकती हैं।

यह मामला सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि एक मां की उस जिद और प्यार की कहानी है, जो हर बाधा के बावजूद अपनी बेटी को सुरक्षित और अपने पास रखना चाहती है।

अब नजर इस बात पर टिकी है कि लोकल कमेटी इस भावनात्मक और संवेदनशील मामले में क्या फैसला लेती है—कानून क्या कहेगा, और ममता को कितना न्याय मिलेगा?



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