गांवों में पादरियों के प्रवेश पर बैन मामला : हाईकोर्ट ने जनहित याचिका की खारिज, कहा – जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए होर्डिंग्स असंवैधानिक नहीं

छत्तीसगढ़ November 3, 2025 • रिपोर्टर: raigarh top news
गांवों में पादरियों के प्रवेश पर बैन मामला : हाईकोर्ट ने जनहित याचिका की खारिज, कहा – जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए होर्डिंग्स असंवैधानिक नहीं

गांवों में पादरियों के प्रवेश पर बैन मामला : हाईकोर्ट ने जनहित याचिका की खारिज, कहा – जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए होर्डिंग्स असंवैधानिक नहीं

गांवों में पादरियों के प्रवेश पर बैन मामला : हाईकोर्ट ने जनहित याचिका की खारिज, कहा – जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए होर्डिंग्स असंवैधानिक नहीं

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कांकेर जिले के गांवों में पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर प्रतिबंध से जुड़ी जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जबरन या प्रलोभन देकर किए जा रहे धर्मांतरण को रोकने के उद्देश्य से लगाए गए होर्डिंग्स असंवैधानिक नहीं माने जा सकते। कोर्ट ने कहा कि ग्राम सभाओं ने अपने सांस्कृतिक और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए ये कदम एक एहतियाती उपाय के रूप में उठाया है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश कुमार सिन्हा और न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ताओं को चाहिए कि वे पेसा नियम 2022 के तहत ग्राम सभा और संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखें।

मामले में कांकेर निवासी दिग्बल टांडी और जगदलपुर निवासी नरेंद्र भवानी ने अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर की थीं। याचिकाओं में कहा गया कि कांकेर जिले के कुदाल, परवी, बांसला, घोटा, घोटिया, मुसुरपुट्टा और सुलंगी सहित कई गांवों में ग्राम सभाओं ने पेसा एक्ट का हवाला देकर होर्डिंग्स लगाए हैं। इन बोर्डों में लिखा गया है कि गांव पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, और ग्राम सभा की अनुमति के बिना पादरियों या धर्मांतरित व्यक्तियों को धार्मिक प्रचार अथवा धर्मांतरण संबंधी गतिविधियों के लिए प्रवेश की अनुमति नहीं है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ये होर्डिंग्स संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) (आवागमन की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन हैं। उनका यह भी आरोप था कि यह कार्रवाई राज्य सरकार के 14 अगस्त 2025 के सर्कुलर से प्रेरित होकर की गई है।

राज्य सरकार ने जवाब में कहा कि याचिकाएं केवल आशंका के आधार पर दायर की गई हैं। सरकार के सर्कुलर में कहीं भी धार्मिक भेदभाव या नफरत फैलाने का निर्देश नहीं है, बल्कि यह केवल अनुसूचित जनजातियों की परंपरागत संस्कृति की रक्षा के उद्देश्य से जारी किया गया था।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि ये होर्डिंग्स जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए हैं, जो सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम है। अदालत ने इसे संविधान के विरुद्ध नहीं माना और दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं।

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