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महिला आरक्षण के पीछे ‘सीटों का खेल’!… 2011 जनगणना पर बवाल, क्या दक्षिण भारत की ताकत होगी कम?

परिसीमन को लेकर सियासी संग्राम तेज, विपक्ष का विरोध, साउथ के राज्यों पर असर को लेकर बढ़ी चिंता

नई दिल्ली।
महिला आरक्षण को लेकर संसद में चल रही हलचल अब एक नए विवाद में बदलती जा रही है। मामला सिर्फ महिलाओं को 33% आरक्षण देने का नहीं, बल्कि सीटों के बंटवारे और राज्यों की राजनीतिक ताकत से जुड़ गया है। इसी वजह से 2011 की जनगणना को आधार बनाने पर बड़ा बवाल खड़ा हो गया है।

महिला आरक्षण लागू करने के लिए लाए जा रहे संशोधन विधेयकों के साथ परिसीमन का मुद्दा भी जुड़ गया है। विपक्षी दलों का कहना है कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन परिसीमन को 2011 की जनगणना से जोड़ना गलत होगा। उनका तर्क है कि नई जनगणना के आधार पर ही सीटों का पुनर्निर्धारण होना चाहिए।

इस विवाद के केंद्र में दक्षिण भारत के राज्य हैं, जहां जनसंख्या वृद्धि दर उत्तर भारत के मुकाबले काफी कम रही है। अगर 2011 की जनगणना को आधार बनाकर परिसीमन किया जाता है, तो सीटों का अनुपात बदल सकता है, जिससे इन राज्यों की संसद में हिस्सेदारी कम होने का डर जताया जा रहा है।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे ‘काला कानून’ तक बता दिया और विरोध का ऐलान किया है। उनकी पार्टी डीएमके ने राज्यभर में प्रदर्शन करने की घोषणा की है।

दरअसल, 2002 में जो परिसीमन हुआ था, वह 1991 की जनगणना के आधार पर किया गया था और उस समय सीटों की कुल संख्या में बदलाव नहीं किया गया था। लेकिन अब अगर सीटें बढ़ाई जाती हैं और उन्हें 2011 की जनगणना से जोड़ा जाता है, तो उत्तर भारत के ज्यादा आबादी वाले राज्यों को फायदा मिल सकता है, जबकि दक्षिण भारत पीछे छूट सकता है।

यही वजह है कि कई विपक्षी दल यह मांग कर रहे हैं कि जनगणना और परिसीमन को आपस में लिंक ही न किया जाए, ताकि किसी क्षेत्र विशेष को नुकसान न हो।









हालांकि, अभी तक सरकार की ओर से यह साफ नहीं किया गया है कि सीटों का अनुपात बदलेगा या सभी राज्यों में सीटें समान रूप से बढ़ाई जाएंगी। सूत्रों के मुताबिक, सरकार मौजूदा अनुपात को बरकरार रखने पर विचार कर रही है, लेकिन अंतिम तस्वीर बिल के पूरी तरह सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या महिला आरक्षण का यह ऐतिहासिक कदम देश को नई दिशा देगा, या फिर यह क्षेत्रीय असंतुलन की नई बहस को जन्म देगा? आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर सियासत और तेज होने के संकेत हैं।



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