बिलासपुर। 23 साल पुराने बहुचर्चित जग्गी हत्याकांड में एक बार फिर बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है, जिसने राजनीतिक और कानूनी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने पहले के फैसले को पलटते हुए सीबीआई की अपील को स्वीकार कर लिया है।
इस फैसले के साथ ही मामले के प्रमुख आरोपी अमित जोगी को तीन सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया गया है। कोर्ट के इस सख्त रुख ने साफ संकेत दे दिए हैं कि यह मामला अब निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुका है।
दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम रामअवतार जग्गी हत्याकांड से जुड़ा है, जिसमें 4 जून 2003 को एनसीपी नेता रामअवतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस समय इस हत्याकांड ने पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी थी।
बाद में इस मामले में कई आरोपियों को दोषी ठहराया गया, लेकिन अमित जोगी को बरी कर दिया गया था। इसी फैसले को चुनौती देते हुए सीबीआई और मृतक के बेटे सतीश जग्गी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए बिलासपुर हाई कोर्ट भेज दिया। इसके बाद हाई कोर्ट में फाइल को फिर से खोला गया और पूरे मामले की नई सिरे से सुनवाई शुरू हुई।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष और सीबीआई की ओर से दलील दी गई कि पहले के फैसलों में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया था। वहीं राज्य सरकार की ओर से भी अपील को लेकर अपना पक्ष रखा गया।
डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा शामिल थे, ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बड़ा फैसला सुनाते हुए सीबीआई की अपील को स्वीकार कर लिया और आरोपी को सरेंडर का आदेश जारी किया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले में सभी आवश्यक पक्षकारों को शामिल करते हुए निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित की जाएगी। पहले जिन याचिकाओं को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया गया था, अब उन्हें नए सिरे से देखा जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इतने सालों बाद भी इस हत्याकांड की गुत्थी पूरी तरह सुलझ क्यों नहीं पाई। वहीं कोर्ट के ताजा आदेश ने यह संकेत भी दे दिया है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं।
फिलहाल, सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या आरोपी समय पर सरेंडर करता है या फिर यह मामला एक बार फिर नए कानूनी मोड़ लेगा।