Exit Polls 2025: क्या होता है एग्जिट पोल्स, कैसे Opinion Polls से अलग, पोल ऑफ पोल्स के बारे में भी जानें

देश November 10, 2025 रिपोर्टर: raigarh top news
Exit Polls 2025: क्या होता है एग्जिट पोल्स, कैसे Opinion Polls से अलग, पोल ऑफ पोल्स के बारे में भी जानें

Exit Polls 2025: क्या होता है एग्जिट पोल्स, कैसे Opinion Polls से अलग, पोल ऑफ पोल्स के बारे में भी जानें

बिहार में 11 नवंबर को जैसे ही विधानसभा चुनावों की दूसरे चरण की वोटिंग खत्म होगी, वैसे ही तमाम टीवी न्यूज चैनल्स पर एग्जिट पोल के दावे शुरू हो जाएंगे. जिसमें संभावित चुनाव परिणामों के बारे में दावा किया जाने लगेगा.

हालांकि भारत में एग्जिट पोल पिछले कुछ सालों में काफी विवादित और अविश्वसनीय हो गए हैं लेकिन इसके बावजूद लोगों के बीच इनका क्रेज बेशक बरकरार है. क्या आपको मालूम है कि एग्जिट पोल होता कैसे है और ये किस तरह ओपिनियन पोल से अलग होता है.

साथ ही साथ आपको ये भी बता दें कि बिहार में 6 नवंबर और 11 नवंबर को दो चरणों के मतदान के बाद वोटों की काउंटिंग 14 नवंबर को होगी. राज्य विधानसभा के सारे परिणाम शाम तक आ जाने की उम्मीद है.

क्या आपको मालूम है कि किस समय आखिर एक्जिट पोल दिखाने की अनुमति भारतीय चुनाव आयोग द्वारा दी जाती है. क्योंकि इसका भी बाकायदा एक नियम है. कोई टीवी चैनल या मीडिया उसका उल्लंघन नहीं कर सकता. चुनाव आयोग की इस हरी झंडी के बाद ही मीडिया पर एग्जिट पोल के रिजल्ट्स के बारे में बताना शुरू किया जाता है. कहना चाहिए कि इस बार केवल टीवी न्यूज चैनल्स ही नहीं बल्कि यूट्यूब चैनल्स ने भी इसके लिए कमर कसी हुई है.

क्या होते हैं एग्जिट पोल्स

एग्जिट पोल असल में रुझानों के जरिए निष्कर्ष निकालने की कोशिश होती है. पोलिंग बूथ पर वोटिंग करके निकल रहे लोगों से बातचीत करके अंदाज लगाया जाता है कि नतीजे किधर की ओर जा सकते हैं. इसके जरिए अनुमान लगाया जाता है कि कौन सा सियासी दल कहां जीत रहा है और कौन कहां पीछे होगा. हालांकि इनके नतीजे खरे उतरने को लेकर हमेशा शक रहा है. ज्यादातर ये असल परिणाम से अलग भी होते रहे हैं.

इसमें बड़े पैमाने पर वोटरों से बात की जाती है. इसे कंडक्ट करने का काम आजकल कई ऑर्गनाइजेशन कर रहे हैं.

क्या एग्जिट पोल्स पर चुनाव आयोग का नियम

चुनाव आयोग ने नियम बना रखा है कि आखिरी चरण की वोटिंग के पहले एग्जिट पोल के जरिए अनुमानित नतीजों का ट्रेंड नहीं बताया जा सकता. आखिरी चरण की वोटिंग के बाद चुनाव आयोग जब शाम को आधिकारिक तौर पर बतायेगा कि आखिर चरण में कितना मतदान हुआ, उसके बाद टीवी चैनल्स और कुछ समाचार साइट्स एग्जिट पोल के वो नतीजे देने लगेंगे, जो उन्होंने खुद या एजेंसियों के जरिए कराए हैं.

चूंकि एग्जिट पोल की सटीकता पर हमेशा ही सवाल उठते हैं लिहाजा ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि ये एग्जिट पोल्स क्या होते हैं और चुनाव परिणामों को लेकर वो जो अनुमान लगाते हैं, वो कितने सटीक होते हैं.

वोटिंग खत्म होने पर ही क्यों एग्जिट पोल्स

– जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 126 ए के तहत वोटिंग के दौरान ऐसी कोई चीज नहीं होनी चाहिए जो वोटरों के मनोविज्ञान पर असर डाले या उनके वोट देने के फैसले को प्रभावित करे. वोटिंग खत्म होने के डेढ़ घंटे तक एग्जिट पोल्स का प्रसारण नहीं किया जा सकता है. और ये तभी हो सकता है जब सारे चुनावों की अंतिम दौर की वोटिंग भी खत्म हो चुकी हो.


मतदान करने के बाद महिलाएं (फाइल फोटो)

क्या एग्जिट पोल्स हमेशा सही होते हैं?

– नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. अतीत में ये साबित हुआ है कि एग्जिट पोल्स ने जो अनुमान लगाए, वो गलत साबित हुए. भारत में एग्जिट पोल का इतिहास बहुत सटीक नहीं रहा है. कई बार एग्जिट पोल नतीजों के बिल्कुल विपरीत रहे हैं.


आमतौर पर एग्जिट पोल्स के पूर्वानुमान वोट देकर निकलने वाले लोगों के रुझान पर ही टिके होते हैं.

ओपिनियन पोल्स और एग्जिट पोल्स में अंतर

– ओपनियन पोल्स वोटिंग से बहुत पहले वोटरों के व्यवहार और वो क्या कर सकते हैं, ये जानने के लिए होता है. इससे ये बताया जाता है कि इस बार वोटर किस ओर जाने का मन बना रहा है. वहीं एग्जिट पोल्स हमेशा वोटिंग के बाद होता है.

ओपिनियन पोल क्या है?

ओपिनियन पोल का सीधा मतलब है जनता की राय. जनता की राय को समझने या मापने के लिए अलग – अलग तरह के वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग किया जाता है.

चुनावी सर्वे में हमेशा रैंडम सैंपलिंग का ही प्रयोग होता है. देश की बड़ी सर्वे एजेंसी लोकनीति – CSDS भी रैंडम सैंपलिंग ही करती है. इसमें सीट के स्तर पर, बूथ स्तर पर और मतदाता स्तर पर रैंडम सैंपलिंग होती है. मान लीजिए किसी बूथ पर 1000 मतदाता है. उसमें से 50 लोगों का इंटरव्यू करना है. तो ये 50 लोग रैंडम तरीके से शामिल किए जाएंगे.

तो इसके लिए एक हज़ार का 50 से भाग दिया तो उत्तर आ गया 20. इसके बाद वोटर लिस्ट में से कोई एक ऐसा नंबर रैंडम आधार पर लेंगे जो 20 से कम हो. जैसे मान लीजिए आपने 12 लिया. तो वोटर लिस्ट में 12वें नंबर पर जो मतदाता होगा वो आपका पहला उत्तरदाता है

जिसका आप इंटरव्यू करेंगे, फिर उस संख्या 12 में आप 20, 20 ,20 जोड़ते जाइये और जो संख्या आए उस नंबर के मतदाता का इंटरव्यू करते जाइए.

ओपिनियन पोल की तीन शाखाएं हैं. प्री पोल, एग्जिट पोल और पोस्ट पोल. आम तौर पर लोग एग्जिट पोल और पोस्ट पोल को एक ही समझ लेते हैं लेकिन ये दोनों एक दूसरे से काफी अलग हैं.

प्री पोल क्या होता है

चुनाव की घोषणा के बाद और मतदान तिथि से पहले जो सर्वे होते हैं उन्हें प्री पोल कहा जाता है. जैसे मान लीजिए कि लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से हैं और चुनाव की घोषणा 10 मार्च को हुई. तो ऐसी स्थिति में 10 मार्च के बाद और 11 अप्रैल के पहले जो सर्वे होंगे उन्हें प्री पोल कहा जाएगा.

ये कब शुरू हुए

माना जाता है कि ये 1967 में सामने आए. एक डच समाजशास्त्री और पूर्व राजनीतिज्ञ मार्सेल वान डेन ने देश में चुनाव के दौरान एग्जिट पोल्स किया. हालांकि ये भी कहा जाता है कि इसी साल अमेरिका में ऐसा पहली बार एक राज्य के चुनावों के दौरान किया गया था. वैसे एग्जिट पोल्स जैसे अनुमान की बातों का 1940 में होना कहा जाता है.

इनका विरोध क्यों होता रहा है?

– क्योंकि आमतौर पर ये न तो बहुत वैज्ञानिक होते हैं और न ही बहुत ज्यादा लोगों से बातकर उसके आधार पर तैयार किए जाते हैं. इसीलिए अमूमन ये हकीकत से अक्सर दूर होते हैं. कई देशों में इन पर रोक लगाने की मांग होती रही है. भारत में वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में चुनाव आयोग ने इस पर रोक लगा दी थी. दुनियाभर में अब ज्यादातर लोग इन्हें विश्वसनीय नहीं मानते.

पोल ऑफ पोल्स क्या होते हैं

भारत में चुनाव परिणामों से पहले “पोल ऑफ पोल्स” वह प्रक्रिया होती है, जिसमें कई अलग-अलग सर्वे या चुनावी पोल के नतीजों को एक साथ मिलाकर एक औसत या कंपलीट अनुमान तैयार किया जाता है. इससे राजनीतिक विश्लेषक और मीडिया यह अंदाजा लगाते हैं कि कुल मिलाकर किस पार्टी या गठबंधन को कितनी सीटें मिल सकती हैं और मुख्य रुझान क्या हैं.

पोल ऑफ पोल्स की प्रक्रिया क्या है

अलग-अलग न्यूज चैनल, सर्वे एजेंसियां और संस्थान चुनाव से पहले ओपिनियन पोल या मतदान के बाद एग्जिट पोल करते हैं. हर पोल का अपना डाटा और गुणात्मक विश्लेषण होता है, जो अलग-अलग परिणाम देता है. “पोल ऑफ पोल्स” में इन सभी के नतीजों को एक साथ मिलाकर औसत या समेकित अनुमान (कंसॉलिडेटेड प्रेडिक्शन) निकाला जाता है ताकि एक तटस्थ और व्यापक अनुमान मिल सके.
इससे एक अकेला पोल पर निर्भर रहना जरूरी नहीं होता. “पोल ऑफ पोल्स” चुनाव परिणाम आने से पहले समग्र माहौल का बेहतर आकलन देता है. हालांकि ये भी अनुमान ही होता है और वास्तविक परिणाम भिन्न हो सकते है. इस तरह “पोल ऑफ पोल्स” लोकतांत्रिक चर्चा को संतुलित और व्यापक नज़रिए से देखने का एक तरीका माना जाता है.

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