Raigarh News: दिल्ली से आए अनीस साबरी की कव्वाली ने दर्शकों को झूमने किया मजबूर

पद्मश्री राधेश्याम बारले की टीम ने बाबा गुरु घासीदास के संदेशों पर दी जीवंत प्रस्तुति
रायगढ़ घराने की ठुमरी पर थिरकी बिलासपुर की इशिका गिरी
श्वेता वर्मा ने कत्थक नृत्य से पूरे चक्रधर समारोह में बिखेरी यश की चांदनी
संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के छात्रों ने सिर पर कलश रखकर अद्भुत लोकनृत्य का किया प्रदर्शन
सितार वादन की मधुर धुनों से प्रो.डॉ.लवली शर्मा ने बांधा समां















समारोह में ओडिशी, कथक, पंथी नृत्य, सितार वादन और कव्वाली की अद्भुत प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को किया मंत्रमुग्ध
चक्रधर समारोह की चौथी शाम सुर, ताल और लय से सराबोर हुआ रायगढ़
रायगढ़, 30 अगस्त 2025/ अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चक्रधर समारोह के 40वें वर्षगांठ के चतुर्थ दिवस रायगढ़ का रामलीला मैदान संगीतमय और सांस्कृतिक रंगों में डूबा रहा। छत्तीसगढ़ शासन संस्कृति विभाग, पर्यटन मंडल एवं जन सहयोग से जिला प्रशासन द्वारा आयोजित इस ऐतिहासिक समारोह में ओडिशी, कथक, पंथी नृत्य, सितार वादन और कव्वाली की अद्भुत प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहे भिलाई छत्तीसगढ़ के पद्मश्री राधेश्याम बारले की टीम, जिन्होंने पंथी नृत्य की ऊर्जामयी प्रस्तुति से दर्शकों को भावविभोर कर दिया। पंथी की सुर, ताल और लय पर दर्शक स्वयं को थिरकने से रोक नहीं पाए।
वहीं, दिल्ली से आए जनाब अनीस साबरी ने अपनी कव्वाली से मंच को सूफियाना रंग में रंग दिया और उपस्थित दर्शकों को आध्यात्मिक आनंद से सराबोर कर दिया। सांस्कृतिक संध्या में रायपुर की सुश्री शिवली देवता, सुश्री भूमिसुता मिश्रा एवं सुश्री लिप्सा रानी बिस्वाल, कटक की डॉ. दीप्ति राउत्रे एवं खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने ओडिशी नृत्य की प्रस्तुति देकर मन मोह लिया। लखनऊ की श्रीमती श्वेता वर्मा और रायपुर की सुश्री इशिका गिरी ने कथक में अपनी अद्भुत कला का प्रदर्शन किया। संगीत की सरिता में प्रो.डॉ. लवली शर्मा (खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय) के सितार वादन ने वातावरण को और भी माधुर्य से भर दिया। पूरे कार्यक्रम के दौरान दर्शकों ने तालियों की गडग़ड़ाहट से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। समापन अवसर पर सभी प्रतिभागियों को जिला प्रशासन द्वारा शाल, श्रीफल एवं प्रशस्ति पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में बस्तर लोकसभा सांसद श्री महेश कश्यप विशेष रूप से शामिल हुए। उन्होंने गणेश पूजन और दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया। सांसद श्री कश्यप ने कहा कि चक्रधर समारोह केवल रायगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर और पहचान है। उन्होंने इसे कला, संगीत और नृत्य साधना का अद्भुत संगम बताते हुए आयोजकों की सराहना की।
शिवली देवता ने पुरी के जगन्नाथ स्वामी पर आधारित मनमोहक प्रस्तुति दी
रायपुर से आई ओडिशी कलाकार सुश्री शिवली देवता ने ओडिशी की मनमोहक प्रस्तुति से की। सुश्री शिवली एक निपुण ओडिसी नृत्यांगना है। ओडिशी नृत्य की उत्पत्ति उड़ीसा के मंदिरों से हुई है और यह नृत्य अपनी लयबद्ध गतियां, जटिल पद चालन तथा मंदिरों में उकेरी हुई मूर्तियों की मुद्राओं के लिए जाना जाता है। शिवली अपनी कोमल मुद्राओं भावपूर्ण अभिनय तथा तालबद्ध निपुणता के माध्यम से भारतीय महाकाव्यों की कालजयी कथाओं को जीवंत कर देती है। शिवली अपनी नृत्य प्रस्तुति को एक आध्यात्मिक अर्पण के रूप में लेती है जो हमारे पुरातन परंपरा को वर्तमान से जोड़ती है। रायपुर से आई प्रसिद्ध नर्तक,कलाकार सुश्री शिवली देवता द्वारा अपनी प्रस्तुति में पुरी के जगन्नाथ स्वामी पर आधारित मनमोहक प्रस्तुति दी गई। उन्होंने अपनी कलाओं के माध्यम से भावभंगिमाओं के साथ लयबद्ध तरीके से मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किए। सुश्री शिवली को विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर उनकी प्रस्तुति के लिए सम्मानित किया गया है।
रायगढ़ घराने की ठुमरी पर थिरकी बिलासपुर की इशिका गिरी
बिलासपुर की 14 वर्षीय प्रतिभाशाली कलाकार इशिका गिरी ने कथक नृत्य में मनमोहक प्रस्तुति दी। इशिका ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत सरस्वती वंदना से की, इसके बाद उन्होंने तोड़े-टुकड़े प्रस्तुत किए और अंत में महाराजा चक्रधर सिंह के रायगढ़ घराने की ठुमरी पर नृत्य कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कम उम्र में ही शास्त्रीय नृत्य में विशेष पहचान बना चुकी इशिका गिरी ने अब तक कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के मंचों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। वर्तमान में वे इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से सम्बद्ध कमलादेवी संगीत महाविद्यालय रायपुर में प्रो. डॉ. आरती सिंह के मार्गदर्शन में नृत्य की बारीकियां सीख रही हैं। वर्ष 2025 में भी इशिका ने भोरमदेव महोत्सव, महिला मड़ई सहित कई प्रतिष्ठित आयोजनों में अपनी नृत्य कला से छत्तीसगढ़ की संस्कृति का गौरव बढ़ाया है।
भूमिसूता मिश्रा एवं लिप्सा रानी ने दिखाया आकर्षक नृत्य कौशल
रायपुर जिले से आईं ओडिसी नृत्यांगनाएं सुश्री भूमिसूता मिश्रा एवं सुश्री लिप्सा रानी बिस्वाल ने अपने अद्वितीय नृत्य प्रदर्शन से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मंच पर उतरीं दोनों कलाकारों ने शास्त्रीय नृत्य की कोमलता, भावभंगिमाओं की गहराई और ताल-लय की अद्भुत प्रस्तुतियों से समारोह का आकर्षण और भी बढ़ा दिया। ओडिसी नृत्य की प्राचीन शैली को जीवंत करते हुए कलाकाराओं ने भगवान गणेश , राधा-रानी संग नाचे मुरली पर आधारित भावपूर्ण आकर्षक प्रस्तुति दी। अंग-संचालन, मुख-मुद्राएँ और पदचालन की सुंदर लयबद्धता ने दर्शकों को ओडिसा की सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई। संगीत और वाद्य-ताल के साथ जब दोनों ने मंच पर नृत्य किया, तो वातावरण में भक्ति और सौंदर्य का अद्भुत संगम देखने को मिला। समारोह में उपस्थित दर्शकों ने तालियों की गडग़ड़ाहट से दोनों कलाकाराओं का स्वागत किया। सुश्री भूमिसूता मिश्रा और लिप्सा रानी बिस्वाल ने जिस निपुणता और भावप्रवणता से नृत्य प्रस्तुत किया, वह ओडिसी परंपरा की समृद्धि और भारतीय शास्त्रीय नृत्य की गरिमा का प्रतीक है। बता दे की मात्र 10 वर्ष की छोटी सी उम्र से ही भूमिसूता मिश्रा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय स्तर के महोत्सवों तथा सांस्कृतिक मंचों पर अपनी विशिष्ट पहचान बन चुकी हैं। सुश्री लिप्सा रानी ने भी अनेक प्रतिष्ठित महोत्सवों और कार्यक्रमों में अपने ओडीसी नृत्य का सौंदर्य प्रदर्शन कर ख्याति अर्जित कर चुकी है।
डॉ. दीप्ति राउतरे एवं टीम ने नमामि राम राघवम और मोक्ष पर श्रोताओं को किया मंत्रमुग्ध
कटक (पूरी घाट) से आईं प्रख्यात नृत्यांगना डॉ. दीप्ति राउतरे और उनकी टीम ने मंच पर ऐसी मोहक नृत्य छटा बिखेरी कि पूरा सभागार तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठा। डॉ. राउतरे और उनकी टीम ने नमामि राम राघवम तथा मोक्ष पर नृत्याभिनय प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति ने भाव, राग और लय का ऐसा अद्वितीय संगम रचा कि भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र और उनके आदर्श मानो सजीव हो उठे। गीत के भावार्थ— मैं उन राम को नमन करता हूँ, जो रघुवंशी, श्यामवर्ण, प्रजाप्रिय और सीता के पति हैं-को कलाकारों ने इतनी सुंदर अभिव्यक्ति दी कि दर्शक भावविभोर हो उठे।
नृत्य की बारीक मुद्राएँ, सूक्ष्म भाव-भंगिमाएँ और मंचीय तालमेल ने कला और भक्ति का ऐसा अनूठा समागम रचा, जिसे देखकर हर किसी के हृदय में भक्ति उमड़ पड़ी। इस अनुपम प्रस्तुति में डॉ. दीप्ति राउतरे के साथ शीतल स्वैन, आकांक्षा राउतरे, बिद्यांशी भट्टा, स्मिता मोहना, रीना बाला लेंका, पल्लवी प्रासफुटिटा, राकेश दास और अंकित साहा शामिल रहे। सामूहिक नृत्य में उनके लयबद्ध तालमेल और सौंदर्यपूर्ण गतियों ने कार्यक्रम को अविस्मरणीय बना दिया। ओडि़शी नृत्य की इस विशिष्ट प्रस्तुति ने न केवल दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया, बल्कि चक्रधर समारोह की गरिमा और भी बढ़ा दी।
श्वेता वर्मा ने कत्थक नृत्य से पूरे चक्रधर समारोह में बिखेरी यश की चांदनी
प्रख्यात कलाकार श्रीमती श्वेता वर्मा ने पूरे चक्रधर समारोह में लखनऊ घराने के कथक नृत्य प्रदर्शन से यश की चांदनी बिखेरी। श्रीमती श्वेता वर्मा मात्र चार वर्ष की उम्र से नृत्य कला से जुड़ गई थी। 5 साल तक उन्होंने बनारस घराने के श्री लच्छू महाराज के शिष्य द्वारा कथक नृत्य सिखा। उन्होंने कथक और भारतीय शास्त्रीय गायन दोनों में विशारद की उपाधि प्राप्त की है। वर्तमान में वे लखनऊ घराने के कत्थक नृत्य में निपूर्ण है।
बता दे कि इन्होंने हर वर्ष विभिन्न नृत्यों का प्रतिनिधित्व संगीत नाटक अकादमी में किया है। कथक नृत्यांगना श्रीमती श्वेता वर्मा ने 2015 में हॉर्टफियर, जेनेश्वर मिश्रा पार्क, लखनऊ में कथक प्रदर्शन, 2016 और 2018 में लखनऊ महोत्सव में कथक का प्रतिनिधित्व, 2019 में देव महोत्सव, बाराबंकी में प्रदर्शन, 2020 में गुरु आरती शुक्ला के साथ डिफेंस एक्सपो, लखनऊ में प्रदर्शन, 2021 में अलाउद्दीन खान संगीत समारोह मैहर में प्रदर्शन, अयोध्या के दीपोत्सव में प्रदर्शन, रामायण मेला, अयोध्या में प्रदर्शन, 2022 में अयोध्या में दीपोत्सव, सावन महोत्सव, उज्जैन में प्रदर्शन, आईआईटी रुड़की, लखनऊ के कार्यक्रम में प्रदर्शन, 2023 में ग्लोबल इन्वेस्टर समिट, लखनऊ में कथक (रुद्रावतार) का प्रदर्शन, घुंघरू समारोह, जबलपुर में प्रदर्शन, 2024 में रामोत्सव अयोध्या में प्रदर्शन, आईआईटी रुड़की के कार्यक्रम में प्रदर्शन और 2025 में अस्सी घाट, वाराणसी में घाट संध्या कार्यक्रम में प्रदर्शन व बांदा महोत्सव में अपना मनमोहक प्रदर्शन देकर ख्याति प्राप्त कर चुकी है। श्रीमती श्वेता वर्मा ने बहुत ही सुंदर और सुमधुर कत्थक की प्रस्तुति दी, जिसने सभी श्रोताओं का मन मोहा।
संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के छात्रों ने सिर पर कलश रखकर अद्भुत लोकनृत्य का किया प्रदर्शन
इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के छात्रों द्वारा छत्तीसगढ़ी संस्कृति पर आधारित विविध छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य की मन को छूने और झुमाने वाली आकर्षक प्रस्तुति दी। उन्होंने सबसे पहले गणपति जगवंदन और गजानन स्वामी के जयकारे से अपने प्रस्तुति की शुरुआत की। कार्यक्रम स्थल पर दूर-दूर से पहुंचे सभी दर्शकों को आज कत्थक, भरतनाट्यम, ओडिसी, तबला, संतूर, सितार, भजन, गजल जैसे विभिन्न शास्त्रीय कलाओं के साथ साथ छत्तीसगढ़ के कलसा, ठीसकी चटकोला, रैला-रीना और करमा लोकनृत्य के रंगो में भी डूबने का अवसर मिला। छात्रों ने सिर पर कलश रखकर अद्भुत कलसा नृत्य का प्रदर्शन किया। जिसने छत्तीसगढ़ की लोक आस्था, पारंपरिक जीवन शैली और कलात्मक कौशल को बखूबी दर्शाया। जिससे पूरा चक्रधर समारोह छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति से सराबोर हो गया।
इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ प्रदर्शन एवं ललित कलाओं के शोध में अग्रणी संस्थान है। यह कला, फैशन डिजाइनिंग, उच्च स्तरीय शोध कार्य आदि विभिन्न गतिविधियों के लिए संपन्न है। यह संस्थान लोक कला के प्रचार व संरक्षण के लिए लगातार कार्य कर रहा है। आज चक्रधर समारोह में कला विश्वविद्यालय खैरागढ़ की टीम द्वारा विभिन्न लोककला का प्रदर्शन एवं निर्देशन डॉ. दीपशिखा पटेल, सहायक प्राध्यापक, लोकसंगीत विभाग के निर्देशन में और प्रो. राजन यादव, अधिष्ठाता, लोक संगीत एवं कला संकाय के मार्गदर्शन में प्रस्तुत किया गया तथा संरक्षिका के दायित्व में कुलपति इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ की प्रो.डॉक्टर लवली शर्मा शामिल हुई। विभिन्न लोक नृत्य के प्रदर्शन में श्री ठेकाराम, श्री सर्वजीत बांबेश्वर, श्री सिद्दार्थ दिवाकर, श्री डेरहु, श्री खगेश पैकरा, श्री खगेश पैकरा, श्री धीरेन्द्र निषाद, कुमारी डिम्पल पुलसत्य, कुमारी वंदना, कुमारी खुशी वर्मा, कुमारी नम्रता गांवर, कुमारी हर्षलता साहू, कुमारी खुलेश्वरी पटेल ने मनमोहक प्रस्तुति दी। साथ ही गायन पक्ष डॉ. परमानंद पाण्डेय, श्री हर्ष चंद्राकर, श्री मनीष, कुमारी सौम्या सोनी और कुमारी साक्षी गढ़पायले द्वारा किया गया।
सितार वादन की मधुर धुनों से प्रो.डॉ.लवली शर्मा ने बांधा समां
इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ की कुलपति एवं देश की प्रख्यात सितार वादक प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने अपनी मनमोहक प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। डॉ.शर्मा ने राग सरस्वती की स्वर लहरियों से जब सितार की तारों को छेड़ा, तो समारोह शास्त्रीय संगीत के मधुर वातावरण से गुंजायमान हो उठा। श्रोताओं ने प्रस्तुति का रसपान करते हुए तालियों की गडग़ड़ाहट से उनका उत्साहवर्धन किया।
गौरतलब है कि प्रो.डॉ.लवली शर्मा ने 15 वर्ष की आयु में श्रीमती वीणाचंद्रा से सितार वादन की शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध सितार वादक श्री कल्याण लहरी से उच्च प्रशिक्षण लिया। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर उपाधि गोल्ड मेडल के साथ हासिल की, वहीं बड़ौदा विश्वविद्यालय से 1986 में पीएचडी प्राप्त की। सितार वादन में अद्वितीय निपुणता के कारण डॉ.शर्मा ने देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर शास्त्रीय प्रस्तुतियां दी हैं। उन्हें कला भूषण सहित अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।
पद्मश्री राधेश्याम बारले की टीम ने बाबा गुरु घासीदास के संदेशों पर दी जीवंत प्रस्तुति
छत्तीसगढ़ की लोकनृत्य परंपरा के ध्वजवाहक पद्मश्री राधेश्याम बारले की टीम ने पंथी नृत्य की अद्भुत प्रस्तुति देकर माहौल को भक्तिमय बना दिया। टीम ने गुरु घासीदास के संदेशों पर आधारित नृत्य की भाव-भंगिमाओं से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। सुर-ताल और लय की सटीकता से प्रस्तुति में लोकसंगीत और आध्यात्मिकता का सुंदर संगम दिखा।
पद्मश्री श्री बारले पंथी नृत्य के सुप्रसिद्ध नर्तक हैं, जिनका नाम देश-दुनिया में मशहूर है। वे बचपन से ही इन नृत्य शैली को अपनाया है। नृत्य करने के साथ उन्होंने कई देशों के नर्तकों को पंथी नृत्य की प्रशिक्षण दी है। श्री राधेश्माम बारले ने पंथी नृत्य के जरिये बाबा गुरु घासीदास के संदेशों को देश-दुनिया में प्रचारित और प्रसारित किया है। गुरु घासीदास के संदेशों को प्रसारित करने में उनका अमूल्य योगदान रहा है, जिसे देखते हुए 9 नवंबर 2021 को भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ सरकार भी उन्हें सम्मानित कर चुकी है। पद्मश्री राधेश्याम बारले का जन्म दुर्ग जिले में हुआ। उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से लोकसंगीत में पत्रोंपाधी प्राप्त की है।
क्या होता है पंथी नृत्य
पंथी नृत्य में सतनाम पंथ के प्रवर्तक बाबा गुरु घासीदास के जीवन और उनके उपदेश मनखे-मनखे एक समान, सत्य, समानता और सामाजिक एकता पर आधारित ‘सतनाम’ (सत्य ही ईश्वर है) के संदेश का गायन किया जाता है। इस नृत्य में एक मुख्य नर्तक होता है, जो गायन की शुरुआत करता है और उसके साथ बाकी साथी नृत्य और गायन करते हैं। पद्मश्री श्री बारले मुख्य नर्तक होते हैं, जो बाबा घासीदास के गायन और उपदेश को शुरू करते हैं। उनके साथ बाकी नर्तक उसे दोहराते हैं और गायन करते हैं। यह नृत्य बहुत धीमी गति से शुरू होता है और इसके साथ मांदर की ताल बजती है धीरे-धीरे गायन और नृत्य बढ़ता जाता है। अंत में गायन खत्म होने से पहले नृत्य और गायन काफी तेज हो जाता है। नृत्य की इस शैली में मांदर और झांझ बजाया जाता है यही दोनों मुख्य वाद्य यंत्र होते हैं। नृत्य की इस शैली में नर्तक अपने पैरों में घुंघरू बांधकर नृत्य करते हैं। गौरतलब है कि चक्रधर समारोह रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान है, जो नृत्य, संगीत और लोक परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन का प्रतीक है।
अनीस साबरी के कव्वाली गीतों की रौनक में देर रात झूमते रहे दर्शक
दिल्ली से आए मशहूर कव्वाल जनाब अनीस साबरी के शानदार कव्वाली प्रदर्शन ने ऐसा समां बांधा कि समारोह स्थल देर रात तक संगीत और तालियों की गूंज से सराबोर रहा। अनीस साबरी ने एक के बाद एक लोकप्रिय कव्वालियों और सूफी गीतों की प्रस्तुति देकर दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
अनीस साबरी ने चक्रधर समारोह में विशेषकर अली मौला, बहती है प्रेम की गंगा बहने दो……..छत के ऊपर एक तिरंगा रहने दो, प्यार झूठा था तो जताया ही क्यूं……..ऐसे जाना था तो आया ही क्यूं, दुश्मनों से मोहब्बत करो, तुझे प्यार करते करते मेरी उम्र बीत जाए…..तेरे दिल की धड़कनों में कोई गीत गुनगुनाऊ, प्यार से प्यार का सामान बनाया जाए, मां से बढ़कर कोई दूसरा प्यार दुनिया में होता नही, जैसे देशभक्ति और सुप्रसिद्ध गीतों की प्रस्तुति ने समारोह में आध्यात्मिकता, ऊर्जा और भारत देश में रहने वाले सभी हिन्दुस्तानियों के मन में देश के प्रति प्यार के लिए जागरूक किए। श्रोताओं में मौजूद हर वर्ग के लोग उनके द्वारा प्रस्तुत कव्वाली और शेरों-शायरी सुनकर झूम उठे और पूरा दर्शक दीर्घा तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठा। जनाब अनीस साबरी द्वारा प्रस्तुत कव्वाली की हर पंक्ति दिलों को छू लेने वाली रही। गीतों की गहराई और उनके स्वर की ताकत ने न सिर्फ सभी का मनोरंजन किया बल्कि श्रोताओं को सूफी परंपरा की आध्यात्मिक अनुभूति भी कराई। अनीस साबरी के कव्वाली प्रदर्शन ने चक्रधर समारोह की गरिमा को नई ऊंचाई दी। देर रात तक चली यह प्रस्तुति दर्शकों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव साबित हुई।
बता दे कि अनीस साबरी देश के सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले युवा सूफियाना कव्वालों में गिने जाते है। उन्होंने 4 वर्ष की उम्र से ही अपने पिता जनाब रईस साबरी से इस कला की बारीकियां सीखनी शुरू की और 6 वर्ष की उम्र में अपना पहला प्रदर्शन शुरू किया। वे अजमेर के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के चिश्ती रंग में गाते है जो 13वीं सदी के सूफी शायर अमीर खुसरो की परंपरा का पालन करते है। सन 2006 में इन्हें कर्नाटक उर्दू अकादमी, बेंगलोर तथा 2007 में अमीर खुसरो अकादमी, चेन्नई से पुरस्कृत किया गया है। सन 2003 में अनीस साबरी ने सोनिक इंटरप्राइजेस के साथ मिलकर कई हिट संगीत एल्बमस जारी किए। जिसमें चिश्ती रंग ने बेहद लोकप्रियता हासिल की।