छत्तीसगढ़

शमशान पर विराजी है माता, केवल इस दिन ही खोलने की है परंपरा, खुदाई के दौरान मिले थे कई नर कंकाल

रायपुर 19 अक्टूबर 2018। राजधानी में एक ऐसा चमत्कारी कंकाली मठ का मंदिर हैं जिसके दरवाजे श्रद्धालुओं के लिये सिर्फ दशहरे के दिन ही खुलते हैं। साल में एक बार ही मंदिर खुलने के कारन माता के दर्शन के लिए मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता सुबह से ही लग जाता है। ये प्राचीन मंदिर पुराणी बस्ती ब्राम्हण पारा में एक तालाब के पास स्थित है। मठ में देवी के विग्रह (प्रतिमा) के साथ अस्त्र-शस्त्र भी स्थापित हैं, उनकी पूजा की जाती है। रात 12 बजे तक पूजा-पाठ और दर्शन के बाद मंदिर को साल भर के लिए बंद कर दिया जाता है। इस मंदिर के निर्माण की कहानी भी निराली हैं, मंदिर का निर्माण मां के दिए हुए एक सपने के बाद हुआ था। कंकाली मठ के नाम से यह मंदिर देशभर में प्रसिद्ध हैं। तो आइये जानते हैं हम राजधानी के इस चमत्कारी मंदिर के बारे में….

मां ने दिए थे दर्शन

17 वीं शताब्दी में कृपालु गिरि इस कंकाली मठ के प्रथम महन्त हुए बाद में इनके शिष्य भभुता गिरि एवं उनके बाद उनके शिष्य शंकर गिरि महन्त बने, ये तीनों महंत निहंग सन्यासी थे, लेकिन समय काल परिवर्तन के साथ महंत शंकर गिरि ने निहंग प्रथा को समाप्त कर अपने शिष्य सोमार गिरि का विवाह कर गृहस्थ महन्त परम्परा का श्री गणेश किया। प्रथम गृहस्थ महन्त श्री सोमार गिरि को कोई संतान नहीं हुए तब उन्होंने अपने शिष्य शम्भु गिरि को महन्त बनाया । शम्भु गिरि के प्रपौत्र श्री रामेश्वर गिरि के पुत्रद्वय गजेन्द्र गिरी गोस्वामी व हरभुषण गिरि गोस्वामी वर्तमतान में इस कंकाली मठ के महन्त व सर्वराकर है।

कंकाली मठ के प्रथम निहंग महन्त कृपालु गिरि को माता जी ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि मुझे इस मठ से हटाकर तालाब के किनारे टीले के ऊपर स्थापित करो । देवी की आज्ञा को शिरोधार्य कर महन्त जी ने वर्तमान प्रसिद्ध कंकाली देवी मंदिर का निर्माण कर हरियाणा से मंगाई हुइ अष्टभुजी श्रीविग्रह को प्रतिष्ठित किया ।

मंदिर का इतिहास 500 साल पुराना है…..

बताया जाता हैं कि इस मंदिर में विराजमान माता 500 साल पहले तक माता कंकाली मठ में प्रतिष्ठित हुआ करती थीं। मान्यता है कि माता दशहरे के दिन कंकाली मठ में विराजित होती हैं, बाकी दिन वे मंदिर में होती हैं। कहा जाता है कि देवी ने 500 साल पहले मठ के महंत कृपालु गिरी महाराज को स्वप्न में मंदिर बनवाने को कहा। माता के निर्देश के बाद मठ की प्रतिमा को मंदिर में स्थापित किया गया। मान्यता है कि माता दशहरे के दिन कंकाली मठ में विराजित होती हैं, बाकी दिन वे मंदिर में होती हैं। चैत्र नवरात्र पर मंदिर में आस्था के हजारों जोत जगमगाते हैं। माता के भक्त अपनी मुराद लेकर यहां भारी संख्या में पहुंचते हैं। कंकाली मठ में एक हजार साल से अधिक पुराने शस्त्रों में तलवार, फरसा, भाला, ढाल, चाकू, तीर-कमान जैसे शस्त्र रखे हुए हैं।

मठ के दर्शन से मनोकामनाएं होती है पूरी…..

इस प्राचिन मठ की मान्यता है कि जो भी मनोकामना लेकर आता है इसकी मनोकामना पूरी हो जाती है। मठ में भले ही देवी के दर्शन एक ही दिन होता हो पर यहां आने वाले भक्तों को माता कभी खाली हाथ नहीं लौटने देती। नौ दिन भक्तों की मुराद पूरा करने के बाद माता रानी के लिये भक्त यहां पूजा पाठ करते है। माता के विश्राम के लिये फूल चढ़ाते हैं। कोमल फूलों पर मातारानी आराम करती है। दिनभर मठ में धूप दीप और माला अपर्ण किया जाता है। दशहरा के दिन माता रानी के दर्शन करना यहां के लोगों के लिए शुभ माना जाता है। भक्तों का मानना है कि माता रानी के दर्शन करने के बाद उन पर साल भर कोई विपदा नहीं आती है। घर और परिवार में खुशहाली बनी रहती है।

मंदिर से लगे तालाब के हरे पानी से होता है दुःख दूर….

मां कंकाली की महिमा अलग है। यहां के तालाब का हरा पानी श्रद्धालु अपने घर ले जाते हैं। मान्यता है कि इससे त्वचा रोग से राहत मिलती है। सिर्फ रायपुरवासी ही नहीं बल्कि देश के अन्य राज्यों से भी भक्त आते हैं और तालाब में डुबकी लगाते हैं।

खुदाई के दौरान मिले थे कई नर कंकाल….

घने जंगलों से घिरे इस क्षेत्र का उपयोग पहले श्मशानघाट के रूप में किया जाता था। लिहाजा खुदाई के दौरान कई नर कंकाल मिले। इसी वजह से तालाब का नाम कंकाली तालाब रखा गया और मंदिर का नाम मां कंकाली मंदिर। सपने में तालाब के पानी के बारे में भी मां ने उन्हें कहा था कि पानी में कई औषधियां घुली रहेंगी। इसका रंग हरा होगा। इसमें नहाने वालों को त्वचा रोगों से मुक्ति मिलेगी। बताया जाता है कि तालाब के पानी में गंधक बहुतायात में मिला हुआ है।

आधी रात होता है ज्योति विसर्जन…..

मां महामाया मंदिर की तरह यहां भी आधी रात में ज्योति विसर्जन किया जाता है. अष्टमी की आधी रात जब सभी लोग सो जाते हैं तब पर्दा लगाकर राज ज्योति विसर्जित की जाती है। इसे सेवादार के अलावा कोई नहीं देख पाता।

बलि प्रथा बंद कर नारियल फोड़ जाने लगे 

यह मठ पुरे वर्ष में एक ही दिन विजया दशमी (दशहरा) के दिन खुलता है । प्रात: काल से लेकर पूरे दिन भर रात्रि 12 बजे तक पूजा – पाठ दर्शन होता है । कंकाली देवी के स्थापना के समय से ही यहाँ बकरों की बलि दी जाती थी। जिसे सन 1976 में तात्कालिक महन्त जी के द्वारा बलि प्रथा को बंद कर श्री फल (नारियल) फोडऩे की शुरुआत की। सन 1965 तथा 1998 में प्राचीन कंकाली तालाब की सफाई के दौरान तालाब के दक्षिण – पूर्व कोने में 4 फीट चौडी व आठ फीट उंचा सुरंग द्वार निकला था कुछ समय पश्चात इसी सुरंग का दुसरा हिस्सा बुढेश्वर मंदिर के सामने एक बडे नाले के पुलिया निर्माण के समय भी देखा गया था ।

कंकाली तालाब में उस समय इतना अधिक मृतक अस्थि कंकाल का विसर्जन किया गया कि हडडी के फास्फोरस का अंश घुलते रहने के कारण इस तालाब के पानी में स्नान करने पर चर्मरोग को दुर करने का प्रभाव आ गया। ऐसा विश्वास अभी भी श्रद्धालु लोगों के मन में है । इसलिए दूर – दूर से चर्मरोगी इस तालाब में स्नान कर तथा मां कंकाली देवी की कृपा से स्वस्थ हो जाते है ।

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