मनोरंजन

एक पूरी पीढ़ी जिसके मनोरंजन पर ‘एंटरटेनमेंट टैक्स’ का पड़ा हथौड़ा

नई दिल्ली: आज के दौर में आप भारत के भीतर किसी ऐसे हिस्से की कल्पना कर सकते हैं, जहां शांति के बावजूद भी एक पूरी पीढ़ी

सिनेमाहॉल देखने से ही महरूम रह गई हो! कश्मीर के राजनीतिक मसले को छोड़ दें तो उत्तराखंड भी सिनेमा के मामले में दूसरा

कश्मीर ही बनता जा रहा है. इस छोटे से राज्य के पहाड़ी इलाकों में बसे अधिकांश शहरों में सिनेमाहॉल बंद हो चुके हैं.

आज भी 70 एमएम के परदे पर सिनेमा को देखने का सपना लिए उत्तराखंड के पहाड़ी शहरों से सिनेप्रेमी राजधानी देहरादून या फिर

राज्य से बाहर कहीं और जाकर अपना यह सपना पूरा करते हैं. सिनेमाहॉल न होने से पहाड़ी इलाकों की एक पूरी पीढ़ी बिना सिनेमाहॉल

देखे ही जवान हो गई और एक पीढ़ी इस उम्मीद में बूढ़ी हो रही है कि फिर से शायद सालों पहले बंद हुए सिनेमाहॉल खुल सकें.

टैक्स ने किया बेहाल
उत्तराखंड में अधिकांश सिनेमाहॉल जीएसटी के लागू होने से पहले ही बंद हो गए थे. इनमें से कुछेक ने कम मुनाफे में भी लंबे समय

तक किसी तरह सिनेमाहॉल की पंरपरा को बचाए रखा लेकिन जब टैक्स, सिनेमाहॉल मालिकों की ही जेब को सिकोड़ने लगे तो धीरे-धीरे सिनेमाहॉल भी बंद होते चले गए. सरकार ने 2017 में जीएटी लागू किया तो एक ही कर लगने से सिनेमाहॉल के दोबारा खुलने की

लोगों को उम्मीद जगी थी, लेकिन ये उम्मीद भी 28 फीसदी तक होने के चलते दम तोड़ती हुई ही ज्यादा नजर आ रही है. सिनेमाहॉल मालिकों को इसमें खास मुनाफा नजर नहीं आया.

क्षेत्रीय सिनेमा की टूटी कमर
सिनेमाहॉल न होने से क्षेत्रीय फिल्मों का बाजार भी उत्तराखंड में बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. अकेले पौड़ी, श्रीनगर, खटीमा,

कोटद्वार, टिहरी, सतपुली, रूद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, गोपेश्वर और जोशीमठ जैसे शहरों में सिनेमाहॉल मालिकों ने सिनेमा से लगातार हो रहे

नुकसान के चलते दूसरे धंधे शुरू कर दिए हैं. इनमें से कई सिनेमाहॉल अब बैंक्विट हॉल में भी तब्दील हो गए हैं तो कुछेक ने अपने

स्पेस का उपयोग दूसरे कामों के लिए शुरू कर दिया है.

सीडी-डीवीडी के सहारे भी बुने सपने
सिनेमाहॉल बंद होने के बाद क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्री के कई लोगों ने सीडी और डीवीडी के जरिए सिनेमा को जिंदा रखा, लेकिन डिजिटल

होती दुनिया के बीच ये प्रयास भी बहुत दिनों तक नहीं टिक सका. आज हालत यह है कि उत्तराखंड की क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्री नामभर

की ही रह गई है. साल-दो साल में कोई जुनूनी प्रोड्यूसर.डायरेक्टर अपनी जेब से पैसे लगाकर स्थानीय बोली में फिल्म बनाता भी है तो

उसके बाद दोबारा कहीं नजर नहीं आता. कारण साफ है कि सिनेमाहॉल न होने और बड़े शहरों में हिंदी फिल्मों के बीच जगह नहीं बना

पाने के चलते रीजनल फिल्म की ये छोटी सी इंडस्ट्री भी ध्वस्त होती चली गई.

वर्ष 2002 तक गोपेश्वर में विश्वनाथ टॉकीज के मालिक रहे सतेन्द्र परमार का कहना है कि लगातार दर्शकों की घटती संख्या और

टैक्स के बाद मामूली मुनाफे के बीच सिनेमाहॉल को खोले रखना खुद के लिए खुद ही आर्थिक संकट को खड़ा करने वाली बात थी.

14 साल पहले जब यह सिनेमाहॉल बंद हुआ था तब इसकी बालकनी की सीट का टिकट 20 रूपए हुआ करता था. इसमें भी टैक्स

के बाद ​फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर को अलग से पैसा देना होता था जो कि सिनेमाहॉल मालिकों पर भारी पड़ रहा था.

40 प्रतिशत था तब एंटरटेनमेंट टैक्स
मनोरंजन कर विभाग से बतौर डिप्टी कमिश्नर रिटायर्ड हुए विनोद रावत का कहना है कि सिनेमाहॉल बंद होने की वजहों के बारे में

जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि दर्शकों की घटती संख्या के बीच मनोरंजन कर भी एक बड़ी वजह बना जिसके चलते सिनेमाहॉल

बंद होते चले गए. जीएटी के लागू होने से पहले 40 फीसदी बतौर एंटरटेनमेंट टेक्स सिनेमाहॉल मालिकों को सरकार को देना होता था.

टिकटों के दाम पहले ही बहुत कम थे, ऐसे में सिनेमाहॉल लंबे समय तक सर्वाइव नहीं कर सके.

हमारे पास अपने सिनेमा के लिए नहीं है माध्यम
गढ़वाली लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी भी मानते हैं कि सिनेमाहॉल न होने से रीजनल फिल्म इंडस्ट्री उततराखंड में ठीक से सांस नहीं ले

सकी. नेगी उततराखंड के सिनेमा की अलग पहचान हैं. उन्होंने तकरीबन 38 सुपरहिट एल्बम मार्केट में उतारे ओर कई फिल्मों के गीत

भी गाए, लेकिन आज की दशा से वो भी आहत नजर आते हैं. उनका कहना है कि हमारे पास अपने सिनेमा के लिए कोई स्पेस ही

नहीं बचा है.

दर्शक नहीं है ऐसा मैं नहीं मानता

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