सम्पादकीय

अस्वच्छता, असहिष्णुता और असुरक्षा के मायने

अपने चुनावी दौरो के दौरान, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अनेक वादे और दावे दोनों किये थे। बहरहाल उनमें वे कितने प्रतिशत खरे साबित हुए हैं यह तो आने वाले चुनावों के नतीजों से पता चलेगा, लेकिन यह तकरीबन सच है कि इतनी सारी लाभप्रद योजनाएं विशेषकर स्त्री केन्द्रित योजनाएं जो उनके गर्भ से लेकर मृत्यु पर्यन्त हैं किसी भी सत्तारूढ़ दल ने नहीं दी थी। पांच वर्ष का कार्यकाल किसी भी योजना को मूर्त रूप लेने के लिए कम है लेकिन इससे सरकार के इरादों की एक झलक तो मिल ही जाती है। उदाहरण के तौर पर स्वच्छता अभियान की ही बात करें तो मोदी जी ने सत्ता की बागडोर संभालने के पश्चात गाँधी जयंती को ”स्वच्छता दिवस ÓÓके रूप में मनाने का निश्चय लेकर उन्हें जो श्रद्धांजलि दी वह सही अर्थों में बापू को अब तक दी गई सर्वश्रेष्ठ श्रद्धांजलि है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। यह लहरों की दिशा के प्रतिकूल तैरने जैसा दुस्साहस था क्योंकि हमारी पारिवारिक, सामाजिक व धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से स्वच्छता की परिभाषा हमारे घरों, सामाजिक दायरों या हमारे देवालयों तक ही सीमित रही। दरअसल स्वच्छता का पाठ हमें पढ़ाया ही गलत तरीके से गया है। हमें बचपन से गंदगी से घृणा या नफरत करना ही सिखाया गया उससे निजात की सीख कभी दी ही नहीं। गंदगी के प्रति इसी घृणा भाव ने हमें इसके निदान से दूर कर दिया जबकि उसे एक चुनौती की तरह लेना सिखलाया जाना था। गंदगी देखकर निगाहें फेरने की बजाए उससे जूझना सिखाया जाना था पर यह हमने कभी नहीं सीखा इसलिए गंदगी एक व्यक्तिपरक समस्या बनकर रह गई यदि इसे समाज की समस्या समझा होता तो ये हालात नहीं होते। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण अपने शहर में हमें आसपास रोज देखने को मिल जाता है कि यदि हम इस अभियान के प्रति सामाजिक स्तर पर गंभीर नहीं है तो व्यक्तिगत स्तर पर किये गये प्रयासों का कोई सार्थक अर्थ नहीं होता बावजूद इन सब के इसके एक सकारात्मक पहलू की झलक अब दिखने लगी है और लोग छलनीदार बाल्टी में पानी के रूकने का इंतजार करने की बजाय धीरे-धीरे छिद्रों को बंद करने के उपाय तलाशने लगे हैं। यह एक शुभ संकेत है।

दरअसल इन सब अभियानों के मूल में हम जाऐं तो हमें लगता है कि मूल स्वच्छता अभियान की दरकार सबसे पहले हमारे दिमाग में होनी चाहिए। जिसे हमने उपेक्षित कर लगभग दरकिनार सा कर दिया है। यहां यह याद दिलाना बेहद जरूरी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में जब मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आई तब देश के एक खास तबके में असहिष्णुता और असुरक्षा की भावनाओं का ज्वार सा उमड़ पड़ा था। जिसमें देश के कई लेखकों खासकर वामपंथी खयाल वालेे लेखकों ने विरोध स्वरूप पुरस्कार वापसी की घोषणा तक कर दी। मानसिक अस्वच्छता का यह एक उदाहरण है जिसके पीछे मोदी सरकार की छबि-धूमिल करने की मंशा भी हो सकती है। पुरस्कार व्यक्ति के रूप में किसी लेखक को नहीं लेखक के माध्यम से उसकी रचना को पुरस्कृत किया जाता है। पुरस्कार लौटाने के इस प्रयोजित अभियान का सच तो यह है कि जिन पैत्तीस लोगों ने पुरस्कार वापसी की घोषणा की थी उनमें बत्तीस लोगों ने तो पुरस्कार राशि लौटाई ही नहीं। डॉ. कौस्तुथ नारायण ने अपनी पुस्तक ”लौटते पुरस्कारों का सचÓÓ में इन साहित्यकारों का सही विश्लेषण किया है।

इसी तरह कुछ लोगों को देश का वातावरण अचानक असुरक्षित सा लगने लगता है। जिन लोगों ने उन्हें बेशुमार इज्जत और शोहरत दी उन्हीं से उन्हें भय??? हैरानी तो तब होती है जब इसके बावजूद वे किसी सुरक्षित देश में नहीं जाते। कितना दोगलापन होता है ऐसे व्यक्तियों के विचार और व्यवहार में। इन्हें तो शहीदों के परिवार वालों से सीख लेनी चाहिए जो अपने प्रिय की शहादत के बाद भी एक पल को खुद को असुरक्षित नहीं महसूस करतेे बल्कि यह कहते हैं बेटा बड़ा होने पर उसे फौज में ही भेजेंगे और यदि बेटी है तो उसका विवाह किसी फौजी से ही करेंगे। यह देश प्रेम का महज एक उदाहरण है। गरीबों के हितों की बात करने वाली सभी पार्टियां यह जानती है कि ”गरीबी हटाओÓÓ का नारा १९७१ में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी द्वारा दिया गया था। लगभग पैतालिस साल पहले का यह नारा कितना सफल रहा यह आप हम प्रत्यक्ष रूप से देख रहें हंै। दलित और शोषित वर्ग से खुद को जोडऩे वाली मायावतीजी यह भूल जाती है कि उन्हीं की पार्टी का नारा ”तिलक, तराजू और तलवार, उनको मारो जूते चारÓÓ जैसे वर्ग विशेष को अपमानित करने वाले नारों को भी देश की जनता ने खामोशी से सह लिया वह देश कैसे असहिष्णु या असुरक्षित हो सकता है।
सत्ता परिवर्तनशील होती है। आज जो लोग सरकार को अस्थिर करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं उन्हें यह सोचना होगा कि येन केन प्रकारेण यदि कभी वो सत्ता में आते है तो उनके साथ भी यही हश्र होने की संभावना बनती है। अत: दलगत राजनीति से उठकर सभी को राष्ट्रहित की सोचनी होगी। वाद विवाद की बजाय परस्पर संवाद की पहल करें तो यह बेहतर होगा। राजनीति मात्र राज तक सीमित न होकर जननीति का रूप ले तब ही देश आगे बढ़ेगा। दावोस में दिये गये अपने भाषण में भी मोदी जी ने यही कहा था कि सृजन की बजाय बड़े-बड़े देश जो विनाश और विध्वंस की ओर अग्रसर हंै यह न केवल संपूर्ण मानवजाति बल्कि पर्यावरण के लिए भी खतरनाक है। आज हमारे लिए यही चिन्तन का प्रमुख विषय है।

आशा त्रिपाठी
asha.kmt@gmail.com

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