रायगढ़सम्पादकीय

कवि लोचन प्रसाद पाण्डेय

रायगढ़ टॉप न्यूज़ छत्तीसगढ़ की विभूतियों पर अपने पाठकों को उत्कृष्ट सामग्री उपलब्ध कराने हेतु वचनबद्ध। पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय की पुण्यतिथि पर डॉ राजू पाण्डेय का एक महत्वपूर्ण आलेख आपके साथ साझा कर रहा हूँ।
अनिल रतेरिया संपादक टॉप न्यूज़

 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लोचन प्रसाद पांडेय को अपनी विख्यात कृति हिंदी साहित्य का इतिहास में आधुनिक काल की नई धारा के द्वितीय उत्थान के कवि के रूप में श्रीधर पाठक,हरिऔध,पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, रामचरित उपाध्याय तथा गिरिधर शर्मा नवरत्न के साथ स्थान दिया है।
रामचंद्र शुक्ल के अनुसार जब पंडितों की काव्य भाषा उत्तरोत्तर आगे बढ़ती हुई लोकभाषा से बहुत दूर पड़ जाती है और जनता के हृदय पर प्रभाव डालने की उसकी शक्ति क्षीण होने लगती है तब शिष्ट समुदाय काव्य भाषा का सहारा लेकर अपनी काव्य परंपरा में जीवन डालता है। रीति काल में रसों और अलंकारों के उदाहरण के रूप में रचना होने से और कुछ छंदों की परिपाटी बंध जाने से हिंदी कविता जकड़ सी उठी थी। आधुनिक काल की नई धारा के प्रथम उत्थान के कवियों भारतेंदु, प्रताप नारायण मिश्र,प्रेमधन, ठाकुर जगमोहन सिंह,अंबिका प्रसाद व्यास ने काव्य धारा को नए-नए विषयों की ओर मोड़ा पर भाषा ब्रज ही रहने दी गई और पद्य के ढांचे अभिव्यंजना के ढंग तथा प्रकृति के स्वरुप निरीक्षण आदि में स्वच्छंदता के दर्शन नहीं हुए।
रामचंद्र शुक्ल के मतानुसार सच्ची और स्वाभाविक स्वछंदता का यह मार्ग हमारे काव्य क्षेत्र में अधिक समय तक न चल पाया। इसका कारण पिछले संस्कृत काव्य के संस्कारों के साथ हिंदी साहित्य में आए महावीर प्रसाद द्विवेदी का प्रभाव था। इसके अतिरिक्त महावीर प्रसाद द्विवेदी कविता में बोलचाल की सीधी-साधी भाषा के प्रयोग का आग्रह करते रहे ।परिणाम स्वरुप इतिवृत्तात्मक पद्यों की हिंदी साहित्य में प्रचुरता हो गई।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का यह मानना है कि अंग्रेजी साहित्य का स्वच्छंदतावाद ट्रू रोमांटिसिज्म था क्योंकि तब इंग्लैंड की काव्य रचना लैटिन की रूढ़ियों में जकडी हुई थी। लैटिन इंग्लैंड के लिए दूर देश की भाषा थी अतः उसका साहित्य भी वहां के निवासियों के अपने चिरपरिचित संस्कार और भाव व्यंजना पद्धति से दूर पड़ता था। किंतु हिंदी साहित्य में रीतिकालीन रूढ़ियां हमारे ही देश के संस्कृत साहित्य से उपजी थीं।प्राकृत अपभ्रंश काव्य भी हमारा ही पुराना काव्य है और पंडितों और विद्वानों द्वारा रूप ग्रहण करते रहने और कुछ बंध जाने के कारण जनसाधारण की भावमयी वाग्धारा से कुछ दूर लगता है किंतु एक ही जाति के बीच आविर्भूत होने के कारण दोनों में कोई मौलिक पार्थक्य नहीं।
भारतेंदु काल में प्रारंभ हुआ जन-जागरण द्विवेदी युग में विकसित हो चुका था। धर्म के क्षेत्र में स्वामी दयानंद, अध्यात्म के क्षेत्र में स्वामी विवेकानंद और राजनीति के फलक पर लोकमान्य तिलक भारतीय गौरव का प्रकाश फैलाने वाले देदीप्यमान नक्षत्र थे। यह नवजागरण भारतखंडे ने संगीत के क्षेत्र में तथा अवनींद्रनाथ ठाकुर और रवि वर्मा ने चित्र कला के क्षेत्र में फैलाया। अब काव्य विषयों में व्यापक परिवर्तन आ गया था राष्ट्रीय भावना के प्रसार हेतु पौराणिक ऐतिहासिक घटनाएं एवं चरित्र कविता में स्थान पाने लगे थे। कृषक शोषित- पीड़ित -दलित तथा मध्यम वर्गीय पात्र सदियों की उपेक्षा के बाद कविता में सम्मान पूर्वक गाए जा रहे थे। लोकजीवन के जननायकों का गौरवगान भी अब होने लगा था।राष्ट्रीय गौरव की स्थापना की प्रबल भावना एवं वैचारिकता से ओतप्रोत द्विवेदी युगीन साहित्य संभवतः इन्हीं विशेषताओं के कारण साहित्यिक प्रौढ़ता को प्राप्त नहीं कर पाया।
लोचन प्रसाद पांडेय बहुपठित थे।काव्य सृजन संबंधी उनकी अपनी अवधारणाएं थीं।
“सत कविता से मानवीय चरित्र का सुधार,पतित और पीड़ित देश का उद्धार,भाषा के दूषणों का संहार,सदाचार का अंगीकार,दुराचार का बहिष्कार, साहित्य के अमूल्य गुणों का प्रचार,नव रसों का संचार हो,सब प्रकार से संसार का उपकार ही होता है। कवि इस मानवी संसार के ब्रह्मा है। उनकी उत्पत्ति अपने आप ही होती है। सत्कविता का प्रथम लक्षण यह है कि साधारण पढ़े-लिखे लोगों को श्रवण मात्र से ही उसका अर्थ बोध हो जाए और वह हां हां कहते सिर हिलाने लगे।इस गौरव को लाने वाली वस्तु केवल सरल भाषा ही है।गद्य की सरल और शुद्ध भाषा पद्य की भी भाषा हो सकती है।सत्कविता का दूसरा लक्षण सहृदयता तीसरा सरसता और चौथा भाव की स्पष्टता है।
POETRY WHICH MAY BE CALLED THE VERY LIFE AND BEAUTY OF LITERATURE AND WHICH PLAYS AN IMPORTANT PART IN IMPROVING THE MORAL SIDE OF MAN, DOES NOT SERVE A LESS USEFUL PURPOSE THAN SCIENCE WHICH CONTRIBUTE TO THE MATERIAL COMFORT OF MANKIND. HENCE THE STUDY OF DIDACTIC POETRY DESERVES AS MUCH PATRONAGE FROM THE PUBLIC AS DOES ANY OTHER BRANCH OF LITERATURE. WHEN LAUDABLE ATTEMPTS ARE BEING MADE AT THE PRESENT DAY TO MAKE HINDI THE LINGUA FRANCA OF INDIA, IT IS INCUMBENT ON EVERY WELL-WISHER OF HINDI TO ENRICH AND ADORN ITS LITERATURE TO THE BEST OF HIS POWER. THE CLAIM OF KHARI BOLI TO BE THE LANGUAGE OF HINDI POETRY IS WELL HIGH ESTABLISHED AND MEASURES ADOPTED FOR ITS POPULARIZATION ARE APPRECIATED BY EVEN THOSE WHO ARE AGAINST ITS USE FOR THE PURPOSE.
आजकल हमारे हिंदी साहित्य संसार में कविता के सत्य गुणों की जड़ उखाड़ने का कुप्रबंध देखकर भारी दुख होता है। कविता में सामाजिक शुद्ध बोलचाल की जगह क्लिष्ट भाषा का प्रचार संस्कृत के बड़े बड़े शब्दों की भरमार,मनमाने शब्द और सूत्र गड़ने का कुव्यवहार तथा शब्दों को नियम और व्याकरण विरुद्ध तोड़-मरोड़कर तुक बढ़ाने का व्यापार सत्कविता के चारु चमत्कार का संहार करना ही है।
समाज कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता पांडेय जी के लिए सर्वोपरि रही,समाज में व्याप्त कुरीतियों पर उन्होंने निर्ममता पूर्वक प्रहार किया। स्त्रियों की दीन दशा ने उन्हें व्यथित किया।दहेज प्रथा बाल विवाह कन्या भ्रूण की हत्या आदि कुरीतियों पर प्रहार करने वाली उनकी कविताएं भावनाओं के आवेग के कारण मार्मिक बन गई हैं भले ही इन का स्वरूप उपदेशात्मक है ।पांडेय जी की कविताओं का आत्मस्फूर्त सामयिकता बोध आश्चर्यचकित कर देने वाला है। इन कविताओं में सामाजिक यथार्थ का निस्संग चित्रण मात्र नहीं है बल्कि कवि की पक्षधरता इन कविताओं में इतनी स्पष्ट है कि कहीं कहीं तो भ्रम हो जाता है यह वर्ग चेतन कवि की प्रतिक्रिया है। किंतु ऐसा नहीं है एक सच्चे मानवतावादी की दलित शोषित पीड़ित विशाल जन गण के प्रति गहरी सहानुभूति होती है यह सहानुभूति कभी तटस्थ नहीं रही,नहीं रहती, नहीं रह सकती। द्विवेदी युगीन सुरक्षित राष्ट्रवाद पांडेय जी की कविताओं में कहीं स्थान न पा सका शोषण का विरोध उनकी प्रकृति रही चाहे वह अंग्रेजी साम्राज्यवादियों द्वारा किया जाने वाला शोषण हो या देशी राजा महाराजाओं एवं पूंजीपतियों द्वारा किया जाने वाला शोषण।
लोचन प्रसाद जी स्वयं एक ग्रामीण कृषक थे यही कारण है कि कृषक द्वारा अपनी रचना और उत्पादन को देखकर अनुभव किए जाने वाले गौरव एवं आनंद को उन्होंने विलक्षण सहजता के साथ अभिव्यक्त किया किन्तु भाग्याश्रित अवैज्ञानिक कृषि बहुकुटुंबता एवं ऋण ग्रस्तता से आक्रांत भारतीय कृषक का जीवन उन्हें हमेशा दंश देता रहा और इन स्थितियों से उसे उबारने की छटपटाहट इन कविताओं में अनुभव की जा सकती है।
पांडेय जी युग द्रष्टा थे। 1914 में ही उन्होंने यह अनुभव कर लिया था कि गांधी जी और उनके अहिंसा दर्शन का जादू पूरे विश्व के सर चढ़कर बोलेगा। साम्राज्यवाद अपनी जड़ें फैलाने के लिए अर्थ तंत्र को खोखला करता है और सांस्कृतिक प्रदूषण का उर्वरक डालता है।लोचन प्रसाद जी ने इस कुटिल एवं जटिल तंत्र की कार्यशैली को भांप लिया था ।यही कारण है कि वह स्वदेशी के उपयोग तथा हिंदी एवं देवनागरी लिपि के प्रयोग पर बल देते थे किंतु ऐसा नहीं था कि उन्होंने पाश्चात्य ज्ञान विज्ञान को पूरी तरह नकार दिया था। उन्होंने नवयुवकों से विदेश जाकर आधुनिक ज्ञान विज्ञान में प्रवीणता प्राप्त करने का आग्रह किया क्योंकि वह जानते थे कि भारतीय धर्म और संस्कृति से परिचित एवं पाश्चात्य ज्ञान विज्ञान से प्रेरित नवयुवक ही देश को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करेंगे। कार्लाइल की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक हीरो एंड हीरो वरशिप में प्रतिपादित अवधारणाओं से प्रेरित होकर पांडेय जी ने वीर शिवाजी एवं महाराणा प्रताप पर कविताएं लिखीं। उन्होंने इन महापुरुषों के जीवन चरित्र को संप्रदाय की संकीर्णता में संकुचित नहीं किया बल्कि राष्ट्र की व्यापकता में प्रसारित कर दिया। मेवाड़ गाथा की भूमिका में पांडेय जी ने लिखा किसी अभिमानी राजा तथा स्वार्थी विद्वान या दुर्बल हृदय वीर के हाथों में इसे समर्पण करने जा कर अनाहूत होते हुए आत्मग्लानि और मनस्ताप से अस्थिर होने की अपेक्षा प्यारे ब्रजेश्वर के अमय चरणों की सेवा में उपस्थित होना क्या लक्षाधिक श्रेयस्कर एवं संतोषप्रद नहीं है।
सम्मान पुरस्कार यशोकीर्ति और धन पांडेय जी के लिए सर्वथा महत्वहीन थे। उनके लिए देश सेवा का आदर्श सर्वोपरि था।मातृभूमि छत्तीसगढ़ की गौरव स्थापना के लिए पांडेय जी ने अथक संघर्ष किया यही कारण है कि छत्तीसगढ़ पर और छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखी गई उनकी रचनाएं अत्यंत सरलता से ह्रदय के तल को स्पर्श कर जाती हैं किन्तु पांडेय जी का छत्तीसगढ़ प्रेम क्षेत्रवाद और भाषावाद की संकीर्णताओं से सर्वथा मुक्त है और यही उसकी शक्ति है।अनुवादक एवं बालसाहित्यकार लोचन प्रसाद पांडेय अत्यंत प्रयोगधर्मी कवि थे। भाषा छंद और तुक संबंधी उनके विलक्षण प्रयोग हमें चमत्कृत कर देते हैं पांडेय जी की कविताओं में द्विवेदी युगीन कविता की समस्त लाक्षणिक विशेषताएं दृष्टिगोचर होती हैं किंतु समाज की अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति के साथ उनकी प्रबल सहानुभूति उस स्पष्ट प्रगतिवादी रुझान को जन्म देती है जो पांडेय जी का अपना है उनके काव्य की स्वछंद भाषा तथा छंद एवं तुक विषयक उनकी प्रयोगधर्मिता उन्हें श्रीधर पाठक की परंपरा में स्थापित करती है। पादपों और पशुओं के लिए भी स्पंदित होने वाला पांडेय जी का भावुक हृदय आज दुर्लभ हो गया है। जब जब पांडेय जी को पढ़ा जाएगा निर्मल मन और भावुक हृदय से उपजी पंडित लोचन प्रसाद जी की कविताएं पाठकों के मन में नई प्रेरणा एवं स्फूर्ति का संचार करेंगी।
डॉ राजू पाण्डेय रायगढ़
संपर्क 9826406528
8871206528

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